छ्त्रपति शिवाजी महाराज द्वारा आमेर के राजा जयसिंह को भेजा गया पत्र

3 मार्च 1665 को छ्त्रपति शिवाजी महाराज ने आमेर के राजा जयसिंह एक पत्र भेजा था| पत्र फारसी भाषा में शेर के रूप में लिखे गए थे| राजा जयसिंह आमेर का राजा थे। जयसिंह सन 1627 में गद्दी पर बैठे थे  और औरंगजेब का मित्र थे  औरंगजेब पूरे भारत में इस्लामी राज्य फैलाना चाहता था लेकिन शिवाजी के कारण वह सफल नही हो रहा था।

औरंगजेब चालाक और मक्कार था। उसने पहले तो शिवाजी से से मित्रता करनी चाही। और दोस्ती के बदले शिवाजी से 23 किले मांगे। लेकिन शिवाजी उसका प्रस्ताव ठुकराते हुए 1664 में सूरत पर हमला कर दिया और मुगलों की वह सारी संपत्ति लूट ली जो हिन्दुओं से लूटी थी।

फिर औरंगजेब ने अपने मामा शाईश्ता खान को चालीस हजार की फ़ौज लेकर शिवाजी पर हमला करावा दिया और शिवाजी ने पूना के लाल महल में उसकी उंगलियाँ काट दीं और वह भाग गया। फिर औरंगजेब ने जयसिंह को कहा की वह शिवाजी को परास्त कर दे। शिवाजी को इसकी खबर मिल गयी थी जब उन्हें पता चला की औरंगजेब हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़ाना चाहता है, जिससे दोनों तरफ से हिन्दू ही मरेंगे। तब शिवाजी ने जयसिंह को समझाने के लिए जो पत्र भेजा था।

प्रस्तुत है उसके कुछ अंश

ऐ सरदारों के सरदार, राजाओं के राजा तथा भरतोउद्यान की क्यारियों के व्यवस्थापक| ऐ रामचंद्र के चैतन्य हृदयांश, तुझसे राजपूतों की ग्रीवा उन्नत है| तुमसे बाबर वंश की राज्यलक्ष्मी अधिक प्रबल हो रही है|

मैंने सुना है की तुम मुझ पर आक्रमण करने आया है| हिन्दुओं के हृदय तथा आँखों के रक्त से तू लाल मुहवाला (यशस्वी) होना चाहता है| परन्तु तू यह नहीं जनता की यह तेरे मूंह पर कालिख लग रही है, क्योंकि इससे देश तथा धर्म को आपत्ति हो रही है|

तुम अपनी ओर से स्वयं दक्षिण विजय करने आता तो मैं तेरे घोड़े के साथ मेरी सेना लेकर चलता और एक सिरे से दुसरे सिरे तक सारी भूमि जीत कर तुझे सौंप देता| परन्तु तू औरंगजेब की ओर से आया है| यदि मैं तुझसे मिल जाऊं तो यह पुरुषत्व नहीं होगा| सिंह लोमड़ीपन नहीं करते| यदि मैं तलवार से काम लेता हूँ तो दोनों ओर हिन्दुओं को हानि पहुंचती है| मुझे इसका खेद है की मुसलमानों के खून पीने के अतिरिक्त किसी अन्य कार्य के निमित्त मेरी तलवार को म्यान से निकलना पड़े|

औरंगजेब न्याय तथा धर्म से वंचित प्राणी पापी, जो मनुष्य के रूप में राक्षस है, जब अफज़ल खान से कोई श्रेष्ठता प्रगट न हुई, न शैस्ताखान की कोई योग्यता देखी तो उसने तुझको हमारे युद्ध के निमित्त नियत किया| वह स्वयं तो हमारे आक्रमण को सहन करने की योग्यता नहीं रखता| वह चाहता है की सिंह गण आपस में लड़कर घायल तथा शांत हो जाएँ जिससे की गीदड़ जंगल के सिंह बन बैठें| यह गुप्त भेद तू कैसे नहीं समझता?

यदि मेरी तलवार में पानी है, यदि तेरे कूदने वाले घोड़े में दम है तो हिन्दू धर्म  के शत्रु पर आक्रमण कर| इस्लाम की जड़ - मूल खोद डाल| तू उस नीच औरंगजेब की कृपा पर क्या अभिमान करता है? यदि तू राजभक्ति की दुहाई देता है तो तू यह तो स्मरण कर की उसने शाहजहाँ के साथ क्या बतराव किया?

यह अवसर हम लोगों के आपस में लड़ने का नहीं है| हिन्दुओं पर इस समय कठिन समय आ गया है| हमारे लड़के – लड़कियां, देश - धन , देवालय और पवित्र देवपूजक इन सब पर संकट आया हुआ है| यदि कुछ दिन ऐसे ही चला तो हम लोगों का कोई चिन्ह भी पृथ्वी पर नहीं रहेगा| बड़े आश्चर्य की बात है की मुट्ठी भर मुसलमान हमारे इतने बड़े देश पर अपनी प्रभुत्ता जमाये हुए हैं| इस समय हम लोगों को हिन्दू धर्म और हिन्दुस्थान की रक्षा के निमित्त अत्यधिक प्रयत्न करने चाहिए| चारों तरफ से धावा करके तुम लोग युद्ध करो| उस सांप का सर कुचल दो| मै इस ओर से दोनों बादशाहों का भेजा निकाल दूंगा| दक्षिण के पटल से इस्लाम का नाम तथा चिन्ह धो डालूँगा| हम लोग अपनी सेनायों की तरंगों को दिल्ली में पहुंचा दें, फिर तो न औरंग (राजसिंहासन) रहेगा और न जेब (शोभा)|

हम लोग शुद्ध रक्त से भरी नदी बहा दें और उससे अपने पितरों की आत्माओं का तर्पण करें| इश्वर की सहायता से हम लोग औरंगजेब का स्थान पृथ्वी के नीचे कब्र में बना दें| यह काम कठिन नहीं है| दो ह्रदय अगर एक हो जाएँ तो पहाड़ को भी तोड़ सकते हैं| इस विषय में मुझे तुझसे बहुत कुछ कहना है, तुझसे सुनना है जो बातें पत्र में लिखना युक्तिसंगत नहीं| मैं चाहता हूँ की हम लोग मिल कर परस्पर बातचीत करें| यदि तू चाहे तो मैं तुझसे साक्षात् बातचीत करने आऊं|

तलवार की शपथ, घोड़े की शपथ, देश की शपथ तथा धर्म की शपथ लेता हूँ की इससे तुझपर कदापि आपत्ति नहीं आएगी| अफ्ज़लखान के परिणाम से तू शंकित मत हो| वह झूठा था| बारह सौ बड़े लड़ाकू हब्शी सवार वह मेरे घात में लगाये हुए था| यदि में पहले ही उसको ना मारता तो यह पत्र तुझको कौन लिखता? तुझे स्वयं मुझसे कोई शत्रुता नहीं है| यदि मैं तुम्हारा उत्तर मेरे अनुकूल पायूँगा तो तुम्हारे समक्ष रात्री को अकेले आऊंगा| मैं तुम्हे वो गुप्त पत्र दिखाऊंगा जो मैंने शैस्ताखान की जेब से निकाल लिए थे|

यदि मेरा यह पत्र तुम्हारे मन के अनुकूल ना पड़े तो फिर मैं हूँ और मेरी काटने वाली तलवार तथा मेरी सेना| कल सूर्यास्त के बाद मेरा खडग म्यान से बाहर निकल आएगा| बस तुम्हारा भला हो|


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