राजा मान सिंह और उनके झंडे की आन

वर्ष 1947 से वर्ष 1985 तक का देश बहुत बदल चुका था लेकिन भरतपुर रियासत का झंडा अभी भी भरतपुर और डीग के किले पर लहराता था। जब इस परिवार के लोग चुनाव लड़ते थे तो चुनाव चिह्न के अलावा रियासत का झंडा ही इनकी पहचान होता था। रियासत के झंडे के प्रति न सिर्फ राज परिवार बल्कि भरतपुर से लगे उत्तर प्रदेश के मथुरा, हाथरस, अलीगढ़ और मुरसान आदि क्षेत्रों में भी बड़ा सम्मान था। वर्ष 1985 में हुए राजा मान सिंह हत्याकांड की असली कहानी भरतपुर रियासत के झंडे के अपमान के इर्दगिर्द ही लिखी गई है।
जमाना कांग्रेस का था लेकिन राजा मान सिंह को किसी दल में जाना मंजूर नहीं था। कांग्रेस से उनका समझौता था कि वह उनके खिलाफ उम्मीदवार भले ही उतारे लेकिन कोई बड़ा नेता प्रचार करने नहीं आएगा। वर्ष 1952 से 1984 तक वह लगातार निर्दलीय चुनाव लड़ते रहे और जीतते रहे। वर्ष 1977 की जनता लहर और वर्ष 1980 की इंदिरा लहर में भी वह अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे। लेकिन, कुछ लोगों को यह बात खटकती रही कि आखिर भरतपुर रियासत में दो झंडे क्यों लगते हैं? मानसिंह को कांग्रेस ‘वॉक ओवर’ क्यों देती है? जब कांग्रेस दूसरी सीटें जीत सकती हैं तो डीग की सीट क्यों नहीं जीत सकती?
इधर, वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। पूरे देश में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की लहर थी। ठीक एक साल बाद वर्ष 1985 में राजस्थान में विधान सभा चुनाव हो रहे थे। तब राजस्थान के मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर थे। बताया जाता है कि उन्होंने डीग की सीट को प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था। 
आजादी के बाद से वर्ष 1985 तक कांग्रेस इस विधान सभा क्षेत्र में किसी भी प्रकार से विजय हासिल नहीं कर पा रही थी। राजा मान सिंह के कद के सामने सभी छोटे पड़ रहे थे। ऐसे में कांग्रेस ने राजा मान सिंह के सामने किसी दूसरे राजा को उतारना बेहतर समझा और आखिर में कांग्रेस की तलाश एक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी बृजेंद्र सिंह को उनकी शाही पारिवारिक पृष्ठभूमि को देखते हुए पूरी हुई। उन्हें राजा मान सिंह के विरोध में खड़ा किया गया। इस खबर से उत्साहित कांग्रेस समर्थकों ने किले में लक्खा तोप के पास लगे राजा मान सिंह के रियासतकालीन झंडे को हटाकर वहां कांग्रेस का झंडा लगा दिया। साथ ही, कई अन्य जगहों पर भी राजा के पोस्टर, बैनर और झंडे आदि फाड़ दिए गए। इसके अलावा भी दोनों पक्ष के कार्यकर्ताओं में भिड़ंत की कुछ छुट-पुट घटनाएं हुईं। इससे मान सिंह नाराज हो गए और झंडे के अपमान के बाद राजा ने जो किया वह इतिहास बन गया।


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