25,000 करोड़ रुपये का रोशनी घोटाला जम्मू-कश्मीर के इतिहास का सबसे बड़ा जमीन घोटाला है – रविशंकर

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने मंगलवार को जम्मू-कश्मीर के रोशनी जमीन घोटाला मामले में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला पर 7 कनाल जमीन पर अवैध तरीके से कब्जा करने का आरोप लगाया। ज्ञात हो कि जम्मू-कश्मीर में 25 हजार करोड़ रुपये के रोशनी जमीन घोटाले में गुपकार गठबंधन में शामिल कई राजनीतिक दलों के नेताओं का नाम सामने आया है, जिसमें फारूक अब्दुल्ला का नाम भी शामिल है।

प्रसाद ने कहा कि कश्मीर की स्वायत्तता की आवाज़ उठाने का झूठा बहाना बनाकर कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के नेता सिर्फ अपने परिवार के लिए ही सुविधाएं जुटाते रहे। वास्तव में गैंग ऑफ लैंड ग्रैबर्स है गुपकार गठबंधन। जम्मू कश्मीर में रोशनी एक्ट का दुरूपयोग कर कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के नेताओं ने सरकारी जमीन का बंदरबांट कर निजी फायदे के लिए अवैध तरीके से उस पर कब्जा किया।

अब्दुल्ला परिवार सहित कई राजनीतिक और जाने माने लोगों ने इसका फायदा उठाया। जिसे जहां मौका लगा, उसने वहां लूट मचाई।  फारूक अब्दुल्ला की बहन सुरैया माटू और बहनोई के नाम भी कब्जे की सूची में शामिल हैं। यहाँ तक कि नेशनल कांफ्रेंस का दफ्तर भी रौशनी एक्ट का गलत फायदा उठाकर गैर-कानूनी तरीके से बनाया गया।

जम्मू एवं कश्मीर उच्च न्यायालय ने रोशनी अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

प्रसाद ने कहा कि  फारूक अब्दुल्ला समेत कश्मीर के तमाम बड़े नेताओं के चेहरों से नकाब उतर गया है। हाई कोर्ट के आदेश में उन नेताओं की पहली सूची सार्वजनिक हुई है जिन्होंने सरकार की संपत्ति को अपनी और परिवार की संपत्ति में बदल दिया था। जांच में पीडीपी सरकार में वित्त मंत्री रहे डॉ हसीब द्राबू समेत कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के कई पूर्व मंत्रियों, नौकरशाहों, व्यापारियों और इनके रिश्तेदार भी शामिल हैं। इन्होंने गरीबों के घर रोशन करने के नाम पर बनाए गए कानून की आड़ लेकर करोड़ों की सरकारी जमीन हड़प ली। बताया जाता है कि हजारों करोड़ के इस घोटाले में शामिल लोगों की अभी तीन से चार और सूची आएंगी। इस घोटाले की जांच सीबीआई कर रही है।

क्या है रोशनी घोटाला?

ज्ञात हो कि जम्मू-कश्मीर राज्य भूमि अधिनियम, 2001 तत्कालीन फारूक अब्दुल्ला सरकार गरीब तबके के लोगों को विधिपूर्वक जमीन उपलब्ध कराने और जल विद्युत परियोजनाओं के लिए फंड इकट्ठा करने के उद्देश्य से लेकर आई थी। इस कानून को रोशनी नाम दिया गया।

इस कानून के अनुसार, भूमि का मालिकाना हक उसके अनधिकृत कब्जेदारों को इस शर्त पर दिया जाना था कि वे लोग मार्केट रेट पर सरकार को भूमि का भुगतान करेंगे। इसकी कट ऑफ 1990 में तय की गई थी। शुरुआत में सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले किसानों को कृषि के लिए मालिकाना हक दिया गया। हालांकि इस अधिनियम में दो बार संशोधन किए गए जो मुफ्ती सईद और गुलाम नबी आजाद की सरकार के कार्यकाल में हुए। उस दौरान इस कानून की कट ऑफ पहले 2004 और बाद में 2007 कर दी गई।

2014 में सीएजी की रिपोर्ट आई जिसमें खुलासा हुआ कि 2007 से 2013 के बीच जमीन ट्रांसफर करने के मामले में गड़बड़ी हुई। सीएजी रिपोर्ट में दावा किया गया कि सरकार ने 25 हजार करोड़ के बजाय सिर्फ 76 करोड़ रुपये ही जमा कराए। हाई कोर्ट ने नौ अक्टूबर को अपने आदेश में तमाम आवंटनों को रद करते हुए सीबीआइ को घोटाले की जांच सौंपी थी। इसके बाद इस मामले की जांच अब सीबीआई कर रही है।


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