जन्मदिन विशेष; अथक परिश्रम, सबल नेतृत्व: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

पॉल कैनेडी की एक पुस्तक है- ‘द राइज एंड फॉल ऑफ ग्रेट पॉवर्स’। पहले इसका जो मुख पृष्ठ होता था, उसमें पृथ्वी को एक अखाड़े के रूप में दर्शाया गया था, जिसमें पांच बड़ी शक्तियों के प्रतीक के तौर पर पांच पहलवान मौजूद थे। अमेरिका, इंग्लैंड, रूस, जापान और जर्मनी। भारत का कहीं कोई संकेत भी नहीं। विश्व इतिहास के जानकार बताते हैं कि दोनों विश्व-युद्धों में भारत की भूमिका निर्णायक थी। जबकि विजेता भारत ही था, सबसे बड़ी सैन्य शक्ति भी भारत था। बस उसके पास न तो नेतृत्व था, न अपना नेतृत्व था।

अब उसी मुख पृष्ठ के उसी अखाड़े की पुनः कल्पना करें। अब जब भी बड़ी शक्तियों का उल्लेख होगा, भारत का नाम हर स्थिति में लेना ही होगा। अंतरिक्ष की शक्ति, दवा की शक्ति, शस्त्रों और अस्त्रों की शक्ति, अनुशासित जन की शक्ति, ज्ञान की शक्ति, धन की शक्ति, सैन्य शक्ति, निर्णय ले सकने में सक्षम नेतृत्व की शक्ति, दूरदृष्टि की शक्ति, विश्व का परिदृश्य बदल सकने की शक्ति। सबसे बढ़कर पर्यावरण, मानवता की सेवा और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ जैसे आदर्शों को व्यवहार में ला सकने की शक्ति।

बहुत पुरानी बात नहीं है, जब छोटे से देश फिजी में भारतीय मूल के प्रधानमंत्री महेंद्र चौधरी की निर्वाचित सरकार को कुछ नकाबपोशों ने बंदूक की नोक पर गिरा दिया था और दुनिया को बताने के लिए इसे “सैनिक तख्तापलट” कहा गया था। भारतवंशियों के साथ इस अत्याचार पर दुनिया चुप थी, और इसमें आश्चर्यजनक कुछ नहीं था। जब स्वयं भारत चुप था, तो दुनिया क्यों मुखर होती?

भारत की और भारतीयों की आज विश्व में प्रतिष्ठा

इसके विपरीत 2014 में इराक में आईएसआईएस के आतंकवादियों ने 46 भारतीय नर्सों को बंधक बना लिया था। इराक में चल रहे हाइब्रिड युद्ध के दौरान वहां किसी की निर्णायक भूमिका नहीं थी, लेकिन भारत ने हस्तक्षेप किया और बिना शोर किए सभी नर्सों को भारत सरकार के विशेष विमान से सुरक्षित केरल ले आया गया।

वही भारत है, वही भारतीय हैं, जिनके साथ कोई भी अत्याचार होता रहता था। और वही भारत है और वही भारतीय हैं, जो अब अपने पासपोर्ट पर दुनिया के 58 देशों में वीजा मांगे बिना भी जा सकते हैं। इस तरह के ढेरों मामले हैं। भारत की और भारतीयों की आज विश्व में प्रतिष्ठा है, सम्मान है और उनकी स्वीकार्यता है। अंतर सिर्फ नेतृत्व का है, नेतृत्व की दृढ़ता का, उसके कलंकातीत होने का, उसकी निष्ठा का, उसकी अपरिमित ऊर्जा का, उसकी दूरदृष्टि का है।

देश को मिला सबल नेतृत्व

यह नेतृत्व है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का, जो आज अपने जीवन के 71वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं और 26 मई 2014 से देश को नेतृत्व दे रहे हैं। जीवनी किसी भी व्यक्ति की लिखी जा सकती है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि जब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उल्लेख होगा, किसी जीवनी लेखक के पास कोई एक ऐसा विषय नहीं होगा, जिस पर वह जीवनी को अभिकेन्द्रित रख सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहली बार शपथ लेने के लगभग तुरंत बाद उनकी तुलना सिंगापुर के महान नेता ली क्वान से करना शुरू कर दिया गया। पश्चिमी देशों में उनके प्रशंसक उन्हें भारत का थैचर कहने लगे। तमाम तरह की बातें हुईं। देश के भीतर कई लोगों को उनमें एक संत नजर आया, कुछ को वह स्वामी विवेकानंद का अवतार लगे, कुछ को छत्रपति शिवाजी का। कुछ लोगों ने उन्हें संदेह की दृष्टि से देखते हुए मार्केटिंग गुरु और राजनीति के माहिर के रूप में देखा।

लेकिन जाहिर तौर पर किसी नेतृत्व का आकलन न तो उसे मिली सीटों और वोटों से हो सकता है, न उसके प्रति व्यक्त किए गए उद्गारों से। नेतृत्व का आकलन सिर्फ उन परिवर्तनों से किया जा सकता है, जो उस नेतृत्व के कारण फलीभूत हुए हों। आइए इन में से कुछ को समझने का प्रयास करें।

पीएम मोदी के नेतृत्व का इन बिंदुओं से कर सकते हैं आकलन

• प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहली बार शपथ लेने के समय भारत किस स्थिति में था? अगर पॉल कैनेडी की पुस्तक के मुख पृष्ठ में दर्शाए गए अखाड़े की बात न करें, तो भी भारत भ्रष्टाचार, आर्थिक कमजोरियों, आत्मविश्वास की कमी, तमाम तरह के अपराधों पर ”कुछ नहीं होगा” किस्म की प्रचलित धारणाओं से त्रस्त था। मन में आकांक्षाएं थीं, लेकिन न उनकी अभिव्यक्ति थी, न कोई उपाय।

• काले धन के स्तर और उसकी पकड़ से भारत को मुक्त कराना इतना बड़ा काम था कि कोई सरकार एक कार्यकाल में उससे पार नहीं पा सकती थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोट बंदी करके न केवल काले धन पर भारी और निर्णायक प्रहार किया, बल्कि भारत में आर्थिक स्वच्छता के एक नए युग की भी शुरुआत कर दी। बाकी कार्य संपत्तियों को आधार कार्ड से जोड़ने जैसे उपायों से किया गया, जो अभी भी जारी है, लेकिन निश्चित रूप से भ्रष्टाचार अब हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है।

• गरीबी को भारत का हॉलमार्क माना जाता था। दशकों से भारत अपनी छवि और अपने यथार्थ में गरीबी से चिपटा हुआ था। वह गरीबी के साथ संघर्ष नहीं कर रहा था, बल्कि गरीबी के साथ जीता आ रहा था। उस समय स्लम डॉग मिलेनियर जैसी फिल्मों को भारत की छवि के संकेतक के तौर पर मान्यता मिल रही थी। पुन: यह समस्या और इसका परिमाण इतना अधिक था कि कोई सरकार एक कार्यकाल में इसका निवारण नहीं कर सकती थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनधन योजना शुरू करके सबसे वंचित वर्गों को अर्थव्यवस्था की मूल धारा में एक भागीदार के तौर पर जोड़ कर लोगों के लिए गरीबी से बाहर निकलने का रास्ता खोल दिया। विस्तार में जाए बिना, यह एक युगांतकारी परिवर्तन था। यह कितनी गहराई से पूर्व विचारित रहा होगा, इसकी कल्पना इससे की जा सकती है कि सरकार ने अपने कार्यक्रमों को गति देने के लिए नीति आयोग का निर्माण सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ किया, और सारा कामकाज फाइलों पर चलते रहने की एक पुरानी लत से मुक्त हो गया। सरकार ने तीन वर्ष के भीतर 1,200 से ज्यादा ऐसे पुराने कानूनों को रद्द कर दिया, जो कामकाज की गति में बाधा बन रहे थे। अगर इसी के साथ जीएसटी को क्रियान्वित करने की एक अन्य युगांतकारी पहल को भी जोड़ा जाए, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में उस रास्ते पर आगे बढ़ा है, जो पहले उसके लिए कल्पनातीत थे। मेक इन इंडिया, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की नीतियों में सुधार, कृषि क्षेत्र में सुधार, अधोसंरचनागत सुधार- सारी चीजें संकेत देती हैं कि जो भी हो रहा है, देश के विकास की एक व्यापक योजना के तहत हो रहा है। अब पीएलआई जैसी योजनाएं इसे 500 खरब डॉलर के लक्ष्य की दिशा में ले जा रही है।

• स्वच्छता सिर्फ स्वास्थ्य का विषय नहीं होती, सभ्यता का भी होती है। यह भी गहरी, गंभीर और विस्तृत समस्या थी। खुले में शौच से भारत को मुक्ति, पीने के लिए नल के पानी की हर घर में उपलब्धता, हर गांव में बिजली की उपलब्धता, उज्जवला योजना, सारे सरकारी कामकाज को डिजिटल करते जाना- ऐसी अकल्पनीय योजनाओं को साकार किया गया।

• मन की बात- प्रधानमंत्री मोदी का एक और अभिनव प्रयोग, जो मूलतः इस देश की लोकतांत्रिक प्रकृति और शक्ति को रेखांकित करता है, इस बात का भी परिचायक है कि प्रधानमंत्री के चिंतन की दिशा क्या है।

• रक्षा क्षेत्र में भारत का उभर कर सामने आना एक ऐसी युगांतकारी घटना है, जो नेतृत्व के महत्व को रेखांकित करती है। बालाकोट पर हुई कार्रवाई ने भारत की दब्बू छवि को सैकड़ों आतंकवादियों के साथ हमेशा के लिए दफन कर दिया। वन रैंक-वन पेंशन से लेकर रक्षा स्टाफ के प्रमुख की नियुक्ति तक सैकड़ों नए सुधारों ने, सैकड़ों नई प्रणालियों की उपलब्धता ने, देश की प्रतिरक्षा को अभेद्य बनाने और बनाए रखने की एक परिपाटी स्थापित कर दी है।

• संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए के चश्मे से ही जम्मू-कश्मीर को देखने की आदत इस क्षेत्र को मुख्यधारा में लौटाने की राह में एक बड़ी बाधा थी। यह बात जानते-समझते सभी थे, लेकिन इसे हटाने के लिए जिस सबल नेतृत्व की आवश्यकता थी, उसकी पूर्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। नेतृत्व की दक्षता का आकलन इतिहास भी करेगा। इतिहास के समझ के ऐसे ही कितने बिंदु होंगे, यह कल्पना कर सकना भी फिलहाल कठिन है।


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