प्रकृति के प्रत्यक्ष देवता भगवान भास्कर की उपासना का महापर्व छठ है। ऋगवेद में इसका वर्णन मिलता है । जनक नंदनी माता सीता छठ व्रत करती थीं । छठी मईया के दाहिने में पुरुष और बाएं में प्रकृति । सदियों से इसी रूप में भगवान आदित्य को पूजा जाता है । प्रकृति ने खुद को छह रुप में बांटा षष्ठी को छठ कहा गया । छठ सिर्फ पूजा, श्रद्धा और भक्ति का त्योहार नहीं इसमें प्रकृति से जुड़ने की परंपरा युग युगांतर से चलती आ रही है ।
लोक आस्था के महापर्व छठ में अनुशासित होकर भगवान सूर्य की उपासना की जाती है । व्रती कठिन नियमों का पालन करते हुए निर्जला रहकर भगवान आदित्य की पूजा अराधना में खुद को समर्पित कर देती हैं। पूजा ऐसे अराध्य देव की जो प्रत्यक्ष हैं...हमारे ह्रदय, मन, और चेतना में हैं । छठ में उगते सूर्य की पूजा तो होती ही है डूबते सूर्य को भी अर्घ्य दिया जाता है । मतलब ये कि जो उगता है वो पूजा जाता है लेकिन जो अस्त हो गया वो खत्म नहीं हुआ वो भी पूजनीय हैं ।
छठ में प्रकृति की पूजा है तो नदियों की भी पूजा है, तालाब पोखरा और झीलों की भी पूजा होती । अपने खेत के उगे केले की, गन्ने की, मूली की, सुथनी की, गागर नींबू की पूजा है । छठ तपस्या है जो व्रत करे उसके लिए, उसके परिवार के लिए और सपूर्ण समाज के लिए भी । 4 दिन तक दुनियादारी से दूर बस मन में छठी मैया उन्हीं की पूजा...आदित्य की अराधना सात्विक रहकर, स्वच्छ रहकर, निर्मल रहकर ...मखमली गद्दे से दूर...धरती पर सोना । सादा लिवास, सहज और निर्मल भाव से हर कोई इस महापर्व में शामिल हो जाता है ।
छठ में पारंपरिक प्रसाद ठेकुआ है टिकरी है, खाजा मिठाई है अपने खेत से गेहूं के पवित्र आंटे से, घर में बनी देसी घी से...जिस गेहूं अनाज, चीनी, घी, गुड़ से ठेकुआ बना वो पहले कभी इस्तेमाल नहीं हुआ । त्योहार के लिए विशेष तरीके से बनाया गया या बड़ी पवित्रता से खरीदा गया । हर एक प्रसाद में सफाई का खास ध्यान रखा गया है इसे तैयार भी लकड़ी के चूल्हे पर किया जाता है ।
भगवान भास्कर की पूजा में न कोई गरीब न कोई अमीर सब बराबर । छठ के घाट पर न जात न पात...हर कोई बराबर...ये आज नहीं सदियों पुरानी परंपरा है । अपनी जेब के मुताबिक हर कोई छठी मैया की पूजा करता है ...लेकिन मकसद सबका एक सिर्फ और सिर्फ भक्ति होती है ।
छठ की बात करें और स्वच्छता की चर्चा न हो ये भला कैसे हो सकता है । दूर्गा पूजा और दीपावली से शुरू हुआ अभियान छठ तक जारी रहता है । स्वच्छता अभियान सिर्फ सरकार की योजना नहीं सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा भी है । आज सरकार इसे प्रोत्साहित कर रही है लेकिन हमारी सदियों पुरानी परंपरा का ये हिस्सा है । दीपावली में हम घर और आस पड़ोस की सफाई करते हैं तो छठ में हम नदियों, तालाबों, झीलों के किनारों की सफाई करते हैं मतलब ये कि छठ सिर्फ सूर्य की पूजा ही नहीं प्रकृति, वायु, जल, और आकाश की भी पूजा है ।