मिस्र के शर्म अल शेख में चल रहे कॉप-27 का रविवार को ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ पर सहमति बनने के साथ ही समापन हो गया। पिछले 2 सप्ताह से चलने वाले इस सम्मेलन को एक दिन के लिए बढ़ा दिया गया था।
लंबे समय से विकासशील और गरीब देश मांग कर रहे थे कि उन्हें जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले नुकसान की भरपाई की जाए। इसी के इर्द गिर्द 'लॉस एंड डेमेज' की पूरी बहस चल रही थी। इसके तहत पांरपरिक तौर पर कार्बन उत्सर्जन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार देशों को यह मदद मुहैया करानी होगी। इसके तहत एक 'लॉस एंड डैमेज' फंड बनाया जाएगा।
‘लॉस एंड डैमेज फंड’ पर क्या घोषण हुई और अब आगे क्या होगा?
नुकसान और क्षति के लिए एक विशिष्ट कोष बनाना प्रगति का एक महत्वपूर्ण बिंदु है, इस मुद्दे को आधिकारिक एजेंडे में जोड़ा गया और पहली बार COP-27 में अपनाया गया है। सरकारों ने नुकसान और क्षति के जवाब में विकासशील देशों की सहायता के लिए नई फंडिंग व्यवस्था के साथ-साथ एक समर्पित कोष स्थापित करने के लिए यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया।
दुनिया भर के देश अगले साल COP-28 में नई फंडिंग व्यवस्था और फंड दोनों को कैसे संचालित किया जाए, इस पर सिफारिशें करने के लिए एक 'संक्रमणकालीन समिति' स्थापित करने पर भी सहमत हुईं। संक्रमणकालीन समिति की पहली बैठक मार्च 2023 के अंत से पहले होने की उम्मीद है।
पार्टियों ने सैंटियागो नेटवर्क फॉर लॉस एंड डैमेज को संचालित करने के लिए संस्थागत व्यवस्था पर भी सहमति व्यक्त की, ताकि विकासशील देशों को तकनीकी सहायता उत्प्रेरित की जा सके जो विशेष रूप से प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील हैं। शर्म अल शेख कार्यान्वयन योजना में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था में वैश्विक परिवर्तन के लिए एक वर्ष में कम से कम 4-6 ट्रिलियन अमरीकी डालर के निवेश की आवश्यकता है।
इस तरह के वित्त पोषण को वितरित करने के लिए वित्तीय प्रणाली और इसकी संरचनाओं और प्रक्रियाओं, संलग्न सरकारों, केंद्रीय बैंकों, वाणिज्यिक बैंकों, संस्थागत निवेशकों और अन्य वित्तीय अभिनेताओं के एक तेज और व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता होगी।
इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है कि 2020 तक प्रति वर्ष संयुक्त रूप से 100 बिलियन अमरीकी डालर जुटाने का विकसित देशों का लक्ष्य अभी तक पूरा नहीं हुआ है जिसके लिए विकसित देशों से लक्ष्य को पूरा करने का आग्रह किया है, और बहुपक्षीय विकास बैंकों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों ने जलवायु वित्त जुटाने का आह्वान किया है।
क्या है ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ और क्या है इसका महत्व ?
27वें संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (COP27) में सभी देशों के प्रतिनिधि ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ स्थापित करने पर सहमत हुए है, लेकिन ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ आखिर है क्या?
दरअसल ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील विकासशील देशों को हुए नुकसान की भरपाई करने में मदद करेगा। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ता में, "नुकसान और क्षति" जलवायु-ईंधन वाले मौसम की चरम सीमाओं या समुद्र के बढ़ते स्तर जैसे प्रभावों से होने वाली लागतों को बयां करता है।
जलवायु वित्त पोषण अब तक ज्यादातर ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के प्रयास में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कटौती पर केंद्रित है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण "नुकसान और क्षति" के रूप में क्या गिना जाना चाहिए, इस पर अभी तक कोई सहमति नहीं है, जिसमें क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे और संपत्ति के साथ ही कठिन-से-मूल्य प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र या सांस्कृतिक संपत्ति शामिल हो सकती है।
55 कमजोर देशों की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि पिछले दो दशकों में उनके संयुक्त जलवायु से जुड़ा नुकसान कुल 525 बिलियन डॉलर, या उनके सामूहिक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 20 प्रतिशत हैं। इन शोध के साथ 2030 तक इस तरह का नुकसान प्रति वर्ष 580 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
लेकिन ये जानना भी जरूरी है कि लॉस एंड डैमेज फंड का आखिर क्या महत्व है?
20वीं सदी के आरंभ से लेकर अब तक विकसित देश औद्योगिक विकास से लाभान्वित हुए हैं जिससे ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन भी हुआ। ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के आँकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 1751 और 2017 के बीच CO2 उत्सर्जन में 47% भागीदारी संयुक्त राष्ट्र और 28 यूरोपियन देशों की था। अर्थात् कुल मिलाकर सिर्फ 29 देश। विकासशील देश आर्थिक विकास की दौड़ में थोड़े पीछे रहे।
ऐसा हो सकता है कि अविकसित देश उत्सर्जन में अभी भी योगदान दे रहे हों, लेकिन इसके लिये उन्हें आर्थिक विकास को रोकने के लिये कहना एक ठोस कारण नहीं होगा। इसलिए ये आवश्यक है की कई उन देशों को विकसित होने का पर्याप्त मौका दिया जाए, जिसके लिए आर्थिक सहायता वें देश दें जिन्होंने उच्च विकास को प्राप्त कर लिया है। इसके लिए एक ऐसे वैश्विक कोष की आवश्यकता महसूस की गई जो अंतराष्ट्रीय स्तर पर इन देशों के लिए आर्थिक सहायता सुनिश्चित करे।
भारत समेत दुनिया ने किया निर्णय का स्वागत
COP-27 में कृषि के अंतर्गत जलवायु कार्रवाई पर चार साल के कार्यक्रम पर भारत की तरफ से केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि हमें किसानों पर शमन की जिम्मेदारियों का बोझ नहीं डालना चाहिए। यादव ने कहा COP27 ऐतिहासिक है क्योंकि इसने नुकसान और क्षति निधि (Loss Damage Fund) पर समझौता किया है। दुनिया ने इसके लिए बहुत लंबा इंतजार किया।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी 'लॉस एंड डैमेज' फंड स्थापित करने के निर्णय का स्वागत किया। अपने वीडियो संदेश में, गुटेरेस ने 'लॉस एंड डैमेज' निर्माण को न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम कहा। गुटेरेस ने जोर देकर कहा कि निर्णय पर्याप्त नहीं होगा, लेकिन ध्यान दिया कि यह टूटे हुए भरोसे के पुनर्निर्माण के लिए बहुत जरूरी राजनीतिक संकेत है। अपनी टिप्पणी में, उन्होंने मिस्र सरकार और COP27 के अध्यक्ष सामेह शौकरी को उनके आतिथ्य के लिए आभार व्यक्त किया।
एंटीगुआ और बारबुडा के पर्यावरण मंत्री मोल्विन जोसेफ और एलायंस ऑफ स्मॉल आइलैंड स्टेट्स के अध्यक्ष ने कहा कि यह सौदा "पूरी दुनिया के लिए जीत" है और "इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में वैश्विक विश्वास को बहाल किया है जो यह सुनिश्चित करने के लिए समर्पित है कि कोई भी पीछे न छूटे।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने COP-27 में हुई प्रगति का स्वागत किया लेकिन उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए "अभी और अधिक किया जाना चाहिए"।
भारत का प्रति-व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन केवल 2.2 टन
वैश्विक स्तर पर भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन केवल 2.2 टन है जो की उसके अपने समतुल्य देशों जैसे अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के देशों से बेहद ही कम है। 'उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट 2022' के अनुसार, भारत समेत शीर्ष अन्य 6 देश यानि चीन, यूरोपीय संघ, इंडोनेशिया, ब्राजील, रूस, और अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक हैं। ये सात देश अंतर्राष्ट्रीय परिवहन, 2020 में वैश्विक GHG उत्सर्जन का 55% हिस्सा रखते है।
सामूहिक रूप से, G-20 सदस्य वैश्विक GHG उत्सर्जन के 75% के लिये जिम्मेदार हैं। विश्व औसत प्रति व्यक्ति GHG उत्सर्जन 6.3 टन था। अमेरिका का स्तर इससे ऊपर है जो कि 14 टन है, रूसी संघ में 13 टन और चीन में 9.7 टन है। भारत इस स्तर पर विश्व औसत से बहुत नीचे बना हुआ है।
कुदरती तौर पर आय और दौलत की ये असमानता उपभोग में अंतर के चलते कार्बन विषमता में बदल जाती है। 2019 में भारत की मध्यम आय वाली 40 फीसदी आबादी ने करीब 2 टन CO2 प्रति व्यक्ति, आमदनी के हिसाब से निचले पायदान की 50 फीसदी आबादी ने तकरीबन 1 टन CO2 प्रति व्यक्ति और शीर्ष की सबसे दौलतमंद 10 प्रतिशत जनसंख्या ने लगभग 8.8 टन CO2 प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जित किया।
दुनिया के तापमान में 1.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि
वर्ष 1990-2014 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा होने वाले उत्सर्जन के कारण दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद लगभग 1-2% प्रभावित हुआ तथा तापमान परिवर्तन के कारण श्रम उत्पादकता तथा कृषि पैदावार पर भी असर पड़ा। वर्ष 2022 के लिये संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की वार्षिक उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पेरिस के निर्धारित लक्ष्यों (तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने) से बहुत पीछे है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव स्वरूप अगर धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो इसके बेहद गंभीर परिणाम हो सकते हैं। 2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते के तहत वैश्विक औसत तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं बढ़ने देने का लक्ष्य रखा गया था और कहा गया था कि इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस पार नहीं होने दिया जाएगा।
बीते चार दशकों से सदी के किसी भी दशक (1850 के बाद के दशक) की तुलना में लगातार वैश्विक तापमान में वृद्धि देखी गई है। 21 वीं सदी के पहले दो दशकों (2001 से 2020) में 1850-1909 के मुकाबले तापमान में 0.99 डिग्री सेल्सियस से अधिक वृद्धि देखी गई। वहीं वैश्विक तापमान में 2011-2020 के बीच 1.09 डिग्री सेल्सियस वृद्धि देखी गई।
शून्य उत्सर्जन के लिए भारत और विश्व की योजनाएं
भारत ने पिछले साल ब्रिटेन के ग्लासलो मे आयोजित कॉप- 26 में घोषणा की थी कि वह पाँच सूत्री कार्य योजना के हिस्से के रूप में वर्ष 2070 तक कार्बन तटस्थता की स्थिति तक पहुँच जाएगा, जिसमें वर्ष 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को 50% तक कम करना शामिल है। भारत एक बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते तथा चौथा सबसे बड़ा वैश्विक उत्सर्जक होने के नाते उन देशों में से एक था जिसे शुद्ध शून्य उत्सर्जन लक्ष्य की घोषणा करने के लिये काफी दबाव दिया जा रहा था।
भारत ने इसे ध्यान में रखते हुए उत्सर्जन को कम करने हेतु अपने लक्ष्य की घोषणा की थी। पेरिस समझौते का बुनियादी ढाँचा स्पष्ट करता है कि हर देश को अपने विकास और जलवायु परिवर्तन के लिये सभी जरूरी उपाय करने की जरूरत है।
भारत ने वर्ष 2022 के अंत तक 175 GW तथा वर्ष 2030 तक 450 GW अक्षय ऊर्जा क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य भी रखा है। भारत अपनी ऊर्जा टोकरी का 40% गैर-जीवाश्म-ईंधन-आधारित और अपने ऊर्जा बाजार के 50% को नवीकरणीय बनाने के लिये प्रतिबद्ध है। भारत ने एक अरब टन कार्बन उत्सर्जन में कमी करने की भी प्रतिबद्धता जताई। भारत 'साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारी के सिद्धांत में विश्वास करता है, जिसके अनुसार विकसित देशों को अपने उत्सर्जन में भारी कमी लाने के लिये पहला कदम उठाना चाहिये। इसके अलावा उन्हें गरीब देशों को उनके पिछले उत्सर्जन के कारण पर्यावरणीय क्षति के लिये भुगतान करके क्षतिपूर्ति करनी चाहिये।
UNEP के एक अध्ययन से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्धताओं से वैश्विक उत्सर्जन में कम-से-कम 26-28 बिलियन टन का सुधार हुआ है। वर्ष 2015 के पेरिस समझौते के बाद से नए कोयला बिजली संयंत्रों की मांग गिर गई है, पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर किये जाने के बाद से 75% से अधिक नियोजित कोयला संयंत्रों को खत्म कर दिया गया है। कई देशों ने भी अपनी शुद्ध शून्य प्रतिबद्धताओं के साथ कदम बढ़ाया है, भारत सहित कुल देशों में से लगभग 84% ने शुद्ध शून्य लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु प्रतिबद्धता दिखाई है। अधिक-से-अधिक देश कोयले को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिये लक्ष्य निर्धारित कर रहे हैं, साथ ही वैश्विक मीथेन प्रतिज्ञा भी की गई है जिसके अंतर्गत जलवायु परिवर्तन जैसी बड़ी चुनौती और इसके कई पहलुओं को देशों द्वारा व्यक्तिगत रूप से कई पहलुओं पर ध्यान दिया जा रहा है लेकिन एक वैश्विक संयुक्त मोर्चा भी स्थापित करने की अभी भी आवश्यकता है।
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने ट्वीट कर कहा, "लॉस एंड डेमेज के लिए फंड बहुत जरूरी है, लेकिन अगर जलवायु संकट ने किसी छोटे द्वीपीय देश को नक्शे से मिटा दिया या किसी पूरे अफ्रीकी देश को रेगिस्तान में बदल दिया तो यह फंड उसका जवाब नहीं है." उन्होंने कहा है कि जलवायु महत्वकांक्षा के मुद्दे पर दुनिया को बहुत बड़ी छलांग लगाने की जरूरत है।