रविवार 2 मई को जैसे ही विधानसभा चुनाव के नतीजे आए उसी दिन शाम से पश्चिम बंगाल में शुरू हुआ राजनीतिक हिंसा (Bengal Violence) का नंगा नाच अब तक जारी है।
आरोप है की चुनाव परिणाम आते ही तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों पर हमला बोल दिया। भाजपा के कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों की हत्या, मारपीट, के साथ साथ महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार, छेड़छाड़ की भी घटनाएं सामने आई है| इसके अलावा घर एवं दुकानों में आग लगा दी गई, दुकानें लूट लिए गए। हिंसा से बचने के लिए अपने पूरे परिवार के साथ हजारों की संख्या में लोग पलायन कर गए। सैकड़ों की संख्या में भाजपा समर्थक लोगों ने पलायन करके पड़ोसी राज्य असम पहुंच करके अपनी जान बचाई।
आरोप है की हिंसा का तांडव होता रहा और पश्चिम बंगाल की पुलिस मूकदर्शक बनी रही।
दूसरी तरफ सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस इसकी निंदा करने या इसको रोकने की प्रयास करने के बजाए नकार रही थी| तृणमूल का कहना है की यह भाजपा की साजिश है। बुधवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके कर्तव्य की याद दिलाई तथा बंगाल में कानून का राज स्थापित करने को कहा तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सारे हिंसा से अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा कि वह अभी ही मुख्यमंत्री की शपथ ले रही है।
सबसे दुखद बात यह रही कि पश्चिम बंगाल एवं देश का एक बुद्धिजीवी वर्ग, देश की मीडिया का एक बड़ा हिस्सा यातो इसको अनदेखा कर रहा या इसे चुनाव के बाद से पश्चिम बंगाल में होने वाली एक सामान्य घटना करा दे रहा है।
गुरुवार को विदेश राज्य मंत्री वी मुरलीधरन के काफिले पर तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों ने हमला कर दिया। इस घटना ने यह साबित कर दिया कि जब पूरे पुलिस काफिले के साथ केंद्र के मंत्री तक सुरक्षित नहीं है तो फिर गरीब असहाय आम जनता की बात कौन करे| उनकी स्थिति की तो सहज कल्पना की जा सकती है।
गुरुवार को खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह स्वीकार किया चुनाव बाद की हिंसा में अब तक 18 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
ऐसा पहली बार हो रहा है जब चुनाव बाद की हिंसा के कारण पश्चिम बंगाल से विपक्ष के समर्थक लोग पलायन करके दूसरे राज्य असम में शरण ले रहे हैं। इस बार बंगाल में हुई हिंसा 1946 में देश के बंटवारे से ठीक पहले हुई डायरेक्ट एक्शन डे के दंगे की जैसी है। उसी डायरेक्ट एक्शन डे के दंगे के बाद देश का विभाजन हो गया था। इस बार भी हिंसा का सबसे ज्यादा प्रभाव उन क्षेत्रों में है मुस्लिम आबादी ज्यादा है। कथित तौर पर उन क्षेत्रों में हिंदुओं के घरों एवं दुकानों को चुन चुन कर के निशाना बनाया जा रहा है।
बंगाल में हो रहे इस हिंसा का सबसे ज्यादा शिकार गरीब एवं कमजोर दलित समाज हो रहा है। भाजपा को 3 से 77 सीटों पर पहुंचने यानी लगभग 40% वोट प्राप्त करने में दलित वर्ग का सबसे ज्यादा योगदान है। इसलिए जब तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने हिंसा शुरू की तो हिंसा का सबसे ज्यादा शिकार भी दलित समाज ही हो रहा है।
बंगाल की राजनीति हमेशा खून खराबे से भरी रही है| बंगाल में राजनीतिक हत्याओं का दौर के वामपंथ के उदय के साथ बढ़ता चला गया| कम्युनिस्ट की सोच रही है कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। वामपंथ ने बंगाल की सत्ता में बने रहने के लिए हिंसा एवं राजनीतिक हत्याओं को अपना हथियार बना लिया।
वामपंथ की इस हिंसक राजनीति का शिकार विपक्ष में रहते हुए खुद ममता बनर्जी भी हुई| लेकिन सत्ता में आने के बाद इस हिंसक राजनीति को ख़त्म करने के बजाय उन्होंने इसे अपनी सत्ता को मजबूत करने का जरिया बना लिया।
हर गांव में क्लब के नाम पर बेरोजगार नौजवान लड़कों की एक टोली बनाकर उन्हें तृणमूल कांग्रेस का लठैत बना दिया गया।
इस स्टेट स्पॉन्सर्ड राजनीतिक हिंसा का मुख्य उद्देश्य गरीब कमजोर मतदाताओं के अंदर इतना डर पैदा कर देना होता है कि वह आगे से विरोध करने की बात तो दूर विरोध में वोट देने की भी हिम्मत न जुटा पाए।
इस बार भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस को कड़ी टक्कर दी और लगभग 38 प्रतिशत वोट प्राप्त करने में सफल रहे। अगर मुस्लिम वोटो का एकतरफा ध्रुवीकरण नहीं हुआ होता तो ममता बनर्जी के लिए जीत पाना बहुत ही मुश्किल था। इसीलिए इस बार पहले ज्यादा हिंसा हो रही है।
तृणमूल के लोगों को लग रहा है कि अगर फिर से मतदाताओं के अंदर में वह डर पैदा नहीं किया गया तो अगलीबार सत्ता को बचाए रखना बहुत मुश्किल हो जाएगा| क्योंकि इस बार तृणमूल को जिन लोगों ने डर से वोट दिया हैं अगली बार उनका भी डर खत्म हो जाएगा।
ममता बनर्जी की सत्ता तभी तक है जब तक यह डर एवं खौफ बना हुआ है| जिस दिन दलित आदिवासी मतदाताओं के अंदर से यह खौफ खत्म हो जाएगा उस दिन ममता बेनर्जी की सत्ता खत्म हो जाएगी। और यही भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है की वह इस डर को कैसे और कब तक खत्म कर पाती है।