लम्बे समय से अलग अलग लोकसभा अध्यक्षों द्वारा एक नए संसद भवन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी जो वर्तमान आवश्यकताओ को पूर्ण कर सके| उसी को देखते हुए गुरुवार को पूरे विधि विधान के साथ वैदिक मंत्रोचार के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नए संसद भवन की आधारशिला रखी|
इसके साथ ही इसको लेकर राजनीति भी शुरू हो गयी| विपक्ष इसकी कड़ी आलोचना कर रहा है| विपक्ष इसे शोक सभा में डी जे बता रहा है तो सरकार से एक बड़ी उपलब्धि|
विपक्ष की आलोचनाओं की परवाह किए बिना सरकार अपने निर्णय के साथ, चाहे वह नए संसद भवन का निर्माण हो या सेंट्रल विस्टा का निर्माण, आगे बढ़ रही है| आखिर क्या कारण है की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार और विशेष करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसी परियोजनाओ जैसे नए संसद भवन का निर्माण हो या सेंट्रल विस्ता का निर्माण हो, को विपक्ष के विरोध के बावजूद आगे बढ़ा रहे है|
वर्त्तमान संसद भवन को लगभग 100 साल पूरे हो गए हैं| अब इसमें वो क्षमता नहीं है कि जो वर्तमान की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें| यानि एक नए संसद भवन की आवश्यकता तो महसूस की जा रही है जो वर्तमान के साथ साथ भविष्य की आवश्यकताओं की भी पूर्ति कर सके| लेकिन यह इस निर्णय का सिर्फ एक पहलु| इसका एक दूसरा पहलु भी है जो की इस निर्णय के पीछे महत्वपूर्ण ड्राइविंग फोर्स है| यानी एक ताकत है जो सरकार को पुश कर रही है विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को| आखिर क्या है वह ताकत, इस निर्णय का दूसरा पहलु| आइये जानते है|
अगर आप वर्तमान में दिल्ली में घूमे तो इस तरह की जो कुछ भी दिखाई देगा उसको या तो मुगलों ने बनाया है या किसी और मुस्लिम शासक का बनाया हुआ है या फिर अंग्रेजों का बनाया हुआ है| पूरी दिल्ली इनके बीच में सिमट जाती है|
देश में एक वर्ग है जो बार-बार चिडाता है टॉन्ट् करता है की आखिर आपने (देश) ने किया क्या है? लाल किला हो, कुतुब मीनार हो, ताजमहल हो, पुराना किला हो यातो मुगलों ने बनाया या किसी अन्य मुस्लिम शासक ने| या फिर इंडिया गेट हो, राष्ट्रपति भवन हो, संसद भवन हो या साउथ ब्लॉक - नॉर्थ ब्लॉक हो यहां तक की लुतीयेन दिल्ली हो, को अंग्रेजो ने बनाया| आपका (भारत) अपना बनाया हुआ है क्या?
अभी जो निर्माण हो रहे है यह उस प्रश्न का उत्तर भी है| चाहे वो संसद भवन हो या सेंट्रल विस्टा का निर्माण हो यह भारत को एक नई पहचान देने की प्रक्रिया है| यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का हिस्सा है| अब इंडिया गेट को ही लीजिये, इंडिया गेट को अंग्रेजों ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद बनाया| युद्ध में शहीद हुए सैनिको के सम्मान में| लेकिन स्वतंत्र भारत के उन वीर जवानो के सम्मान लिए, जिन्होंने इस देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, कोई स्मारक नहीं था| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 में सत्ता में आने के बाद इंडिया गेट के सामने ही नेशनल वार मेमोरियल यानि राष्ट्रीय समर स्मारक की स्थापना की गई| जहाँ उन वीर जवानों के नाम अंकित है जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है| उसी तरह अपने कर्तव्य पथ पर अपने प्राणों की आहुति देने वाले पुलिस के जवानो के सम्मान में राष्ट्रीय पुलिस स्मारक का निर्माण भी मोदी सरकार द्वारा ही किया गया| यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के अंतर्गत हुआ|
अब संसद भवन का निर्माण हो रहा है| इसका निर्माण वर्तमान परिस्थितियों एवं भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए किया जा रहा है जो अगले लगभग डेढ़ सौ वर्षों तक भारत की आवश्यकताओ को पूर्ण करने में सक्षम होगा| इसके साथ ही यह भारत को नई पहचान भी दे रहा है| इसका निर्माण पूरी भारतीय परंपरा और संस्कृति के अनुसार हो रहा है| इसका शिलान्यास वैदिक मंत्रोचार के बीच विधि विधान के साथ किया गया| इसमें देश के हर कोने की झलक देखने को मिलेगी| देश की विविधता देखने को मिलेगी| यह देश की वास्तुकला एवं संस्कृति अपने में समाहित किये हुए होगा| यानि अब भारत का संसद भारतीयों द्वारा बनाया हुआ होगा| स्वतंत्र भारत का संसद होगा और भारतीय संस्कृति और परंपरा को समाहित किया हुआ होगा|
इसी तरह राष्ट्रपति भवन एवं इंडिया गेट के बीच में सेंट्रल विस्ता को बनाने की योजना है| अभी भारत सरकार के मंत्रालय अलग-अलग भवनों में है| लेकिन जब सेंट्रल विस्ता का निर्माण होगा तो इसमें वर्तमान में नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक है उनको संग्रहालय में बदल दिया जायेगा| राष्ट्रपति भवन से इंडिया के बीच में दोनों तरफ मंत्रालय बनाए जाएंगे| राष्ट्रपति भवन सामने एक तरह प्रधानमंत्री का आवास एवं कार्यालय होगा तो दूसरी तरफ उपराष्ट्रपति का आवास एवं कार्यालय| फिर आगे दोनों तरफ मंत्रालयों के भवन होंगे| वर्तमान में भारत सरकार के अलग-अलग मंत्रालय पूरे दिल्ली में अलग-अलग जगहों पर हैं| लेकिन जब सेंट्रल विस्ता का निर्माण हो जाएगा तो सारे मंत्रालय एक जगह हो जाएंगे| इसका निर्माण नई परिस्थितियों एवं आधुनिक तकनीक को ध्यान में रखकर होगा|
यह सब राजधानी को एक नई पहचान देगा| अंग्रेजों द्वारा बसाई गई लुटियन दिल्ली का भारतीय कारण होगा| स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री एवं सरकार के मंत्रालय स्वतंत्र भारत द्वारा बनाए गए कार्यालयों से चलेंगे न की अंग्रेजो एवं मुगलों द्वारा बनाये गए भवनों से|
एक बार नए संसद भवन और सेंट्रल विस्ता का निर्माण कार्य पूर्ण हो जाने के बाद फिर कोई यह नहीं कह पायेगा की यह मुगलों एवं अंग्रेजो द्वारा बनाया हुआ है| सब कुछ भारतीयों द्वारा बनाया हुआ होगा, भारत की स्वतंत्र सोच, अपनी आवश्यकताओं, अपनी संस्कृति, अपनी परंपराओं के अनुरूप होगा|
यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का एक हिस्सा है| चाहे श्री राम मंदिर का निर्माण हो या काशी में विश्वनाथ धाम का निर्माण हो, गुजरात में स्टैचू ऑफ यूनिटी का निर्माण हो सब इसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एक हिस्सा है| सब स्वतंत्र भारत का, खुद का बनाया हुआ है| जिस पर हर भारतीय को गर्व हो| जिसको देखकर अंग्रेज या मुगलों की गुलामी कि नहीं आत्म सम्मान एवं स्वाभिमान की अनुभूति हो|
जब भी हम लालकिला, संसद भवन, नॉर्थ ब्लॉक - साउथ ब्लॉक को देखते है तो स्मरण आता है कि इन भवनों का निर्माण मुगलों एवं अंग्रेजो ने किया है, जिन्होंने हम पर शासन किया| लेकिन जब नया संसद भवन देखेंगे, सेंट्रल विस्टा देखेंगे, राष्ट्रीय समर स्मारक देखेंगे और आगे बढ़कर के श्री राम मंदिर देखेंगे, विश्वनाथ धाम देखेंगे तो इस तरह की भावना नही आएगी और मन में एक आत्मसम्मान एवं गर्व की अनुभूति होगी| आत्मसम्मान के बिना आत्मनिर्भर भारत का निर्माण संभव नहीं है| देश को और नागरिकों के आत्म सम्मान के लिए देश को एक नई पहचान की जरूरत है| जिसकी अपनी स्वतंत्र पहचान हो, गुलामी कि नहीं|
इसलिए नया संसद भवन एवं सेंट्रल विस्टा का निर्माण, सिर्फ भवन का निर्माण नहीं है| यह इतिहास का निर्माण, एक पहचान का निर्माण है| स्वतंत्र भारत को स्वतंत्र पहचान देने का प्रयास है| इसीलिए विरोध के बावजूद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन निर्माण कार्यो को पूरी ताकत से आगे बढ़ा रहे है|