बीपी मंडल (B P Mandal) का नाम कौन नहीं जानता? 25 अगस्त 1918 को बिहार के मधेपुरा के बहुत ही धनी यादव जमींदार परिवार में जन्मे बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल यानी बीपी मंडल 1968 में बिहार के सातवें मुख्यमंत्री बने थे। वह लगभग एक महीना बिहार के मुख्यमंत्री रहे।
दिसंबर 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई ने पिछड़ी जातियों के अध्ययन के लिए एक पांच सदस्यीय पिछड़ा वर्ग आयोग (Backward Classes Commission) का गठन किया तथा बिहार के मधेपुरा से सांसद बीपी मंडल को उस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। इसीलिए पिछड़ा वर्ग आयोग को मंडल आयोग या मंडल कमीशन (Mandal Commission) भी कहा जाता है।
मंडल आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को सौंपी। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी (OBC) के लिए सरकार एवं शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की सिफारिश की। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया। एक दशक बाद 1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया।
प्रधानमंत्री वीपी सिंह के इस निर्णय ने भारतीय समाज एवं राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। समाज एवं राजनीति में जाति हावी हो गई। राजनीति के पुराने सारे समीकरण बदल गए।
बीपी मंडल भारतीय राजनीति का ऐसा व्यक्तित्व बन गए जिनके बिना भारतीय राजनीति का इतिहास लिखा ही नहीं जा सकता। यद्यपि बीपी मंडल की मृत्यु 13 अप्रैल 1982 में ही हो गई थी लेकिन 1990 में वी पी सिंह द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हैं बीपी मंडल एक राजनेता से मसीहा बन गए। ऐसी शख्सियत जिसे समाज का एक वर्ग मसीहा मामानने लगा तो दूसरा विलेन।
बीपी मंडल ने देश की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। जाति समाज एवं राजनीति का अभिन्न अंग बन गया। अब जब भी देश की राजनीति की बात होती है तो हमेशा मंडल से पहले एवं मंडल के बाद की राजनीति की बात होती है।
आज तीन दशक बाद देश में एकबार फिर जातीय राजनीति को गरमाने की कोशिश की जा रही है। आगामी जनगणना में जाति आधारित जनगणना caste based census के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा केंद्र सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है। देश में जाति आधारित जनगणना की मांग सबसे ज्यादा बिहार के राजनीतिक दलों द्वारा की जा रही है। इसकी मांग सबसे जोर-शोर से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार Bihar Chief Minister Nitish Kumar एवं उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड कर रही है।
यद्यपि विपक्षी लालू प्रसाद यादव एवं उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल शुरू से ही जाति आधारित जनगणना की मांग करती रही है लेकिन इसबार जैसे ही जाति आधारित जनगणना की मांग उठी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बड़ी रणनीतिक कुशलता के साथ अपने आप को जाति आधारित जनगणना की मांग के केंद्र में ला कर खड़ा कर दिया। जाति आधारित जनगणना की मांग को लेकर बयान देने, पत्र लिखने के साथ-साथ अपनी अध्यक्षता में बिहार से एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल लेकर दिल्ली मर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात भी कर ली।
नीतीश कुमार ने बड़ी सरलता से सफलतापूर्वक अपने आपको जाति आधारित जनगणना की मांग का चेहरा बना दिया। अब अगर केंद्र सरकार इसके पक्ष या विपक्ष में जैसा भी निर्णय लेती है, दोनों ही परिस्थितियों में देश की राजनीति पर इसका असर पड़ेगा। यह बात नीतीश कुमार अच्छी तरह से जानते है, वह खुद सोशल इंजीनियरिंग एवं जातीय समीकरण के माहिर खिलाड़ी है।
कुछ लोग जाति आधारित जनगणना की मांग को मंडल 2.0 मान रहे। राजनीतिक गलियारों में ऐसी चर्चा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने आप को मंडल 2.0 का चेहरा बनाना चाहते हैं।
आने वाले समय में जाति आधारित जनगणना की मांग को बिहार की राजनीति का और गरमाना निश्चित है। ऐसे में राजनीति के नए समीकरणों के बनने एवं बिगड़ने की सम्भावना से इंकार नही किया जा सकता है। वर्ष 2022 बिहार की राजनीति में बहुत उथल पुथल वाला वर्ष साबित हो सकता है।