उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने सार्वजनिक जीवन में सामाजिक मूल्यों के क्षरण पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने आगाह किया कि, लोग राजनीतिक वर्ग के लिए अपना विश्वास खो देंगे यदि इस व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने और स्वच्छ राजनीति को बढ़ावा देने की दिशा में तत्काल तथा सामूहिक कार्रवाई नहीं की जाती है।
इंडिया फाउंडेशन द्वारा हैदराबाद में आयोजित तीसरे अटल बिहारी वाजपेयी स्मृति व्याख्यान में नायडू ने जोर देकर कहा कि, यह सुनिश्चित करना सभी राजनीतिक दलों का परम कर्तव्य है कि, विधायकों और सांसदों सहित उनके सभी सदस्य हर समय और सभी स्थानों पर अपना नैतिक आचरण बनाए रखें। उन्होंने विधायकों और सांसदों से चर्चा के स्तर को ऊपर उठाने, निर्धारित मानकों का अनुसरण करने, अनियंत्रित व्यवहार से बचने और हमेशा 3 डी - चर्चा, बहस और निर्णय का पालन करने तथा 4 डी-विघटन से बचने की अपील की।
उपराष्ट्रपति ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि मूल्य-आधारित राजनीति का अभाव, विचारधारा की कमी, सत्ता, बाहुबल और धनबल की भूख तथा राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों का प्रवेश ही राजनीति के क्षेत्र में हिंसा का प्रमुख कारण है। उन्होंने चेतावनी दी कि, "जब तक इन अवांछनीय प्रवृत्तियों की जांच नहीं की जाती है, तब तक स्थिति और बिगड़ जाएगी और देश की राजनीति को अपूरणीय क्षति हो सकती है"।
जिस तरीके से दलबदल-रोधी कानूनों को अप्रभावी बना दिया गया है, उस पर ध्यान आकर्षित करते हुए, श्री नायडू ने दलबदल-विरोधी कानूनों को और अधिक कठोर एवं प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। इस बात का ज़िक्र करते हुए कि, दलबदल के मामलों और इस समस्या को लंबे समय तक अनदेखा नहीं किया जा सकता है, उपराष्ट्रपति ने सुझाव दिया कि पीठासीन अधिकारियों द्वारा तीन महीने के भीतर ही दलबदल के मामलों को निपटारा करना अनिवार्य कर दिया जाए। उन्होंने कहा कि अगर हम दल - विरोधी कानूनों में खामियों को दूर करने में नाकाम रहे तो हम लोकतंत्र का मखौल उड़ाएंगे।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि, सभी राजनीतिक दल 'सुविधा की राजनीति' को समाप्त करें और 'आस्था की राजनीति' तथा 'सर्वसम्मति की राजनीति' करें, जिसका मार्गदर्शन स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था।
नायडू ने राजनीतिक दलों से लोक लुभावनवाद को दूर करने और दीर्घकालिक विकास को प्राथमिकता देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि, “राजनीतिक दलों को प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद का सहारा नहीं लेना चाहिए और इस तरह की नीतियां दीर्घ काल में अनुत्पादक साबित होंगी। भारतीय राजनीति में 4 सी - नकदी, जाति, आपराधिकता और समुदाय - के बोलबाले पर नाराजगी व्यक्त करते हुए उपराष्ट्रपति ने जनता से 4 सी - चरित्र, व्यवहार, कैलिबर और क्षमता के आधार पर अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करने की अपील की। उन्होंने कहा कि, ऐसे स्वस्थ राजनीतिक वातावरण में ही भारत का लोकतंत्र फल-फूल सकता है और अन्य देशों के लिए एक आदर्श प्रस्तुत कर सकता है।
उपराष्ट्रपति नायडू ने युवाओं से अटल जी जैसे दूरदर्शी राजनेताओं के जीवन से सीख लेने तथा भ्रष्टाचार, किसी भी रूप में भेदभाव, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और गरीबी की समस्या जैसी बुराइयों को खत्म करने में सबसे आगे रहने की अपील की।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उपराष्ट्रपति ने उन्हें भारत के साथ - साथ विदेश में भी सबसे सम्मानित और प्रशंसित प्रधानमंत्रियों में से एक बताया। नायडू ने अटल जी को शालीनता, मर्यादा और शिष्टाचार का प्रतीक बताते हुए कहा कि, वाजपेयी जी ने देश के लोगों को प्रेरित किया और उनकी सद्भावना एवं आत्मविश्वास को सराहा।
व्याख्यान के विषय "लोकतांत्रिक आम सहमति का निर्माण - वाजपेयी मार्गदर्शन" पर बोलते हुए नायडू ने कहा कि अटल जी के लिए, 'सहमति' एक तिकड़मी राजनीतिक उपकरण नहीं था, बल्कि यह उनके दृढ़ विश्वास का एक मुख्य तत्व था। उपराष्ट्रपति ने कहा कि, उनकी सहमति के दृष्टिकोण ने अटल जी को सामाजिक और राजनीतिक स्पेक्ट्रम में व्यापक रूप से स्वीकार्य बना दिया था।
उनके नए दृष्टिकोण ने उन्हें अस्थिर गठबंधन सरकारों के युग में अपने पूर्ण कार्यकाल में सफलतापूर्वक एक बड़े गठबंधन का नेतृत्व करने में सक्षम बनाया। श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा गठबंधन की राजनीति के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए नायडू ने उन्हें भारत में 'गठबंधन राजनीति की प्रथाओं के जनक' के रूप में संबोधित किया।
उपराष्ट्रपति ने कहा हालांकि, अटल जी की सर्वसम्मति बनाने की क्षमता का मतलब हर समय समझौता करना नहीं होता था। उन्होंने 1999 में प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी के दूसरे कार्यकाल के उदाहरण का हवाला दिया जब उन्होंने एक गठबंधन सहयोगी के दबाव में आने से इनकार कर दिया था और अपनी सरकार का त्याग कर दिया।