कोरोना के 2nd फेज में लाखों परिवार प्रभावित हुए। हज़ारों लोगों ने अपनी जान गंवा दी। बेहतरीन स्वास्थ सेवा की दुहाई देने वाली दिल्ली की सरकार फेल हो गई। कहीं ऑक्सीजन की कमी से लोग मरे तो अधिकांश लोग दवा मिलने के बाद भी मरे। आखिर क्यों? बेहतरीन डॉक्टर्स भी हज़ारों की संख्या में बहुमूल्य जानें नहीं बचा सके। कोरोना से बचाने के लिए डॉक्टर्स को स्टेरॉइड्स का इस्तेमाल करना पड़ा। कई डॉक्टर का कहना था कि दवा असर नहीं कर रही या दवा और ज़्यादा जल्दी असर करें उसके लिए स्टेरॉइड्स दिया जा रहा है।
लेकिन, क्या कभी आपने सोचा कि विश्वस्तरीय कंपनियों की दवा कोरोना पर क्यों असर नहीं कर रही? ऐसा नहीं है कि कोरोना कोई नई बीमारी है, जिस पर जीवन रक्षक दवाइयां असर नहीं कर रही हैं। कई वर्षों से ऐसा देखा जा रहा है कि मामूली सी खांसी, ज़ुकाम व पेट सम्बन्धी बीमारी जो लगभग २५-३० वर्ष पहले मामूली दवाइयों से २-३ दिन में ठीक हो जाती थीं, अब उन्हें ठीक होने में महंगी एंटीबायोटिक्स व कई अन्य दवाइयों के सेवन के साथ ७-१० दिन का समय लगता है। ख़ास बात यह है कि इसके बाद भी कई मरीज़ पूर्णतः ठीक नहीं होते और ये बिमारियां बार-बार होती रहती हैं।
इसकी कई वजहों में सबसे मुख्य वजह हैं, जीवन रक्षक दवाइयों की गुणवत्ता में कमी। जी हां, दवाइयों की गुणवत्ता में कमी। दवाइयों की गुणवत्ता में कमी का एक मुख्य कारण यह है कि उन्हें सही तापमान पर स्टोर नहीं किया जाता है, जिसकी वजह से दवाइयों की गुणवत्ता कम हो जाती है। और, यही कारण है कि कोरोना के इलाज में भी इस्तेमाल होने वाली अधिकांश दवाओं को केमिस्ट और थोक विक्रेता तय तापमान पर स्टोर ही नहीं करते, जिसकी वजह से दवा की गुणवत्ता कम होती जाती है।
समूचे भारत में और खासकर देश की राजधानी दिल्ली में लगभग ८० फीसदी केमिस्ट दुकानें लाइसेंस्ड एरिया के बाहर तक काउंटर लगाकर जीवन रक्षक दवाओं को स्टोर और बिक्री करते हैं। वायुमंडलीय तापमान दुकान के भीतर के तापमान को प्रभावित करता है। लगभग ८० फीसदी जीवन रक्षक दवाइयों को २५ डिग्री से कम तापमान पर धूल रहित वातावरण में स्टोर करना चाहिए और बाकी दवाइयों को २-८ डिग्री के बीच फ्रिज में स्टोर करना चाहिए। लेकिन, भारत में न तो केमिस्ट और न ही थोक विक्रेता, दवाओं को सही तरह से स्टोर करते हैं। यहां तक की अधिकांश दवा कम्पनिया भी दवाइयों को सही तरह से स्टोर नहीं करती हैं।
"गुड फार्मा प्रैक्टिस" के तहत केमिस्ट, डिस्ट्रीब्यूटर्स एवं दवा उत्पादकों को कई काम करने अनिवार्य हैं। इसके तहत -
१ - दवा निर्माता, डिस्ट्रीब्यूटर्स एवं रिटेल केमिस्ट को सर्वप्रथम जीवन रक्षक दवाइयों को उचित तापमान पर स्टोर करना अनिवार्य है, जबतक की वह expire नहीं होती।
२ - साथ ही किसी भी दवा को या किसी भी वास्तु को जो ड्रग लाइसेंस पर ली गई हैं, उसे लाइसेंस्ड एरिया में ही रखना अथवा स्टोर करना अनिवार्य है, यदि कोई इसकी अवहेलना करता है तो यह कानूनन जुर्म है।
३ - जो भी लाइसेंस्ड एरिया है, वहां "डस्ट फ्री" माहौल में दवाई का स्टोरेज अनिवार्य है।
भारत में उपरोक्त नियमों का पालन नहीं हो रहा है। इसकी वजह से मरीज़ों पर दवा सही तरह से असर नहीं कर रही हैं। यानी कि जो दवा अमूमन 3-4 दिन में असर करनी चाहिए उसके प्रकृति के अनुरूप वह सही तरह से स्टोर न करने की वजह से 7-15 दिन तक असर करती है। इसकी वजह से मरीज़ को या उसके परिजनों को कई गुना अधिक पैसा खर्चना पड़ता है और बिना वजह मरीज़ के शरीर में केमिकल का भी प्रवेश हो रहा हैं, जिससे उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता लगातार ख़त्म हो रही है। इस सन्दर्भ में SOCIO ECONOMIC RESEARCH INSTITUTE ने 2018 में CDSCO को एक ज्ञापन देकर यह मांग की थी कि समस्त भारत में एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में "ड्रग्स & कास्मेटिक एक्ट -1940" को सख्ती से लागु कर यह सुनिश्चित करें कि दवाई की स्टोरेज एवं बिक्री लाइसेंस्ड एरिया से ही हो, जिसमे उचित तापमान पर स्टोरेज की सही व्यवस्था होनी चाहिए। जैसे, अप्पोलो फार्मेसी में होता है। CDSCO ने SERI की दरखास्त को "ड्रग कंट्रोल डिपार्टमेंट, दिल्ली" को रेफर किया, फिर SERI के डेलिगेशन के समक्ष दिल्ली ड्रग कण्ट्रोल विभाग के अधिकारियो ने माना कि यह बहुत ही जटिल समस्या है पर वे लाचार हैं। इसके बाद, "सेरी" ने लोकसभा की समिति को अपनी दरख्वास्त प्रेषित की जिसके प्रतिउत्तर में "CDSCO" ने माना की SERI की दलील सही है पर ड्रग्स इंस्पेक्टर की कमी की वजह से उपरोक्त VIOLATIONS हो रहे हैं। साथ ही "CDSCO" ने अपनी रिपोर्ट में यह भी माना कि यदि दवा को उचित तापमान पर स्टोर न किया जाए तो उसकी गुणवत्ता तो प्रभावित होती ही है, साथ ही वह "टॉक्सिक" भी हो जाती हैं। अगर दिल्ली ड्रग कंट्रोल डिपार्टमेंट सहित सभी राज्य सरकार या CDSCO एक सर्कुलर जारी कर दे, जिसमें सभी केमिस्ट को अपनी दुकान को शीशे के फ्रेम लगवाकर दवा स्टोर करना अनिवार्य हो, जिससे वायुमंडलीय गर्म हवा या धूल दवा की गुणवत्ता को प्रभावित न करें तो इस समस्या का निदान संभव है। इसी तर्ज पर बाकी भारत में भी काम हो सकता है। अगर दवाई को सही तापमान पर लाइसेंस्ड एरिया में स्टोर किया जाए तो भारतीयों की जान-माल की रक्षा हो पाएगी। वरना, दवा व्यापार से जुड़े लोगों की लापरवाही व लालच की वजह से असंख्य लोग "मेडिकल टेर्रोसिस्म" का शिकार होते रहेंगे और भारत विश्व के सर्वाधिक बीमार लोगों का देश बन जाएगा। भारत में खाने की वस्तु में मिलावट, पीने के पानी में प्रदुषण व हवा भी प्रदूषित होने की वजह से लाखों लोग बीमार हैं और उपचार के लिए जो दवा का सेवन कर रहे हैं वह भी "टॉक्सिक" हो तो फिर मरीज़ का भगवान ही मालिक है।
कोरोना की वैक्सीन को तय तापमान पर स्टोर करना अनिवार्य है तो कोरोना के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जीवन रक्षक दवाइयों को तय तापमान पर क्यों नहीं स्टोर किया जाता? मृत्यु एक अटल सत्य है जिसे कोई टाल नहीं सकता। क्या भारत का स्वास्थ विभाग और सभी राज्य सरकार मृतक मरीज़ को उचित गुणवत्ता की दवा तक उपलब्ध नहीं करवा सकती? यह तो ठीक वैसे ही हुआ कि जैसे किसी व्यक्ति के अंतिम समय उसे गंगाजल या शुद्ध जल देने की बजाय प्रदूषित पानी पिला दिया जाए और यह कह कर कि अब तो मरने ही वाले हो तो शुद्ध पानी पीकर क्या करोगे।
अभी भी समय है, भारत सरकार और सभी राज्य सरकारें जनहित में ड्रग्स एंड कास्मेटिक एक्ट १९४० को सख्ती से लागु करें जिससे कि जीवन रक्षक दवाइयों को सही तरह से स्टोर किया जाए और बेशकीमती इंसानी जान की रक्षा की जा सके।