सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग की ओर भारत ने बढ़ाए कदम

कुछ साल पहले तक भारत इलेक्ट्रॉनिक्स आयात पर अत्यधिक निर्भर था। आज भारत में 16 बिलियन डॉलर के निर्यात के साथ 76 बिलियन डॉलर की इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण अर्थव्यवस्था है। अब भारत का अगला उद्देश्य एक मजबूत सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम का निर्माण करना है। इसी कड़ी में केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना तकनीक (IT) मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि भारत की पहली सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन यूनिट की घोषणा आने वाले सप्ताहों में होगी। भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) पार्टनरशिप समिट को संबोधित करते हुए उन्होंने ये बात कही।

सेमीकंडक्टर के घरेलू उत्पादन पर फोकस

सेमीकंडक्टर फैब एक विनिर्माण संयंत्र होता है, जिसमें रॉ सिलिकॉन वेफर्स को इंटीग्रेटेड सर्किट में बदला जाता है। सेमीकंडक्टरों का घरेलू उत्पादन केंद्र सरकार का प्रमुख एजेंडा है, क्योंकि कोविड-19 के बाद इसकी आपूर्ति में व्यवधान आया है। इस व्यवधान का असर ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग पर काफी पड़ा है। केंद्र सरकार विनिर्माण को प्रोत्साहित करने और हिस्सेदारों के साथ सक्रियता से काम करने की भी कवायद कर रही है। जिसके चलते ये उम्मीद की जा रही है कि आने वाले 3 से 4 साल में भारत एक बेहतरीन सेमीकंडक्टर उद्योग का केंद्र बनने को तैयार होगा।

अमेरिका के साथ समझौता हुआ

पिछले सप्ताह अमेरिका और भारत ने सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला स्थापित करने और नवोन्मेष साझेदारी के लिए समझौता किया था, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में चिप्स के महत्व का पता चलता है।  इसके तहत अमेरिका भारत को सेमीकंडक्टर टेक्‍नोलॉजी देने में मदद करेगा। इस समझौते का उद्देश्य भारत और अमेरिका दोनों देशों की चीन और ताइवान जैसे खिलाड़ियों पर निर्भरता को भी कम करना है। इन सेमीकंडक्टरों और चिप्स का निर्माण हिस्सा एक बहुस्तरीय प्रक्रिया है। इसमें आपूर्ति-श्रृंखला नेटवर्क, कच्चा माल, डिजाइनिंग, आईपी अधिकार, असेंबली, हाथ से काम और उपचार से संबंधित कई चरण शामिल हैं। यह सब अकेले एक देश के लिए शुरू करना और वितरित करना संभव नहीं है। इस दृष्टि से भारत ने अमेरिका के साथ जिस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं, वह वैश्विक सेमीकंडक्टर केंद्र बनने की भारत की महत्वाकांक्षाओं में एक बहुत ही सकारात्मक पहल विकास है।

आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए किये जा हा रहे प्रयास

भारत का सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना एक बड़ा लक्ष्य है, लेकिन केंद्र सरकार इस दिशा में सफलता के लिए हर कदम उठाने को प्रतिबद्ध है। सेमीकंडक्टर इंडस्‍ट्री दुनिया में तो लंबे समय से चल रही है लेकिन भारत ने इस पर कुछ ही सालों से काम करना शुरू किया है, ऐसे में अमेरिका के साथ समझौते को भारत की इस इंडस्ट्री के लिहाज के बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत को सेमीकंडक्टर उद्योग का वैश्विक हब बनाने के विजन के साथ केंद्र सरकार ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन की शुरुआत की। इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत पिछले साल इजराइल के ISMC एनालॉग फैब ने सेमीकंडक्टर चिप बनाने वाला संयंत्र स्थापित करने के लिए कर्नाटक में $3 बिलियन का निवेश करने की घोषणा की थी। इसके बाद ताइवान की इलेक्ट्रॉनिक कंपनी फॉक्सकॉन और स्थानीय समूह वेदांत द्वारा 19.5 बिलियन डॉलर के निवेश की घोषणा भी की गई। दोनों कंपनियों की भारत में चिप्स बनाने के लिए मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी लगाने की योजना है।

सेमीकंडक्टर में आत्मनिर्भरता क्यों जरूरी है ?

मौजूदा समय में जब से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हुआ है तब से दुनिया में सेमीकंडक्टर की आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई है। इस आपूर्ति के बाधित होने का सबसे बड़ा असर ऑटोमोबाइल इंडस्‍ट्री पर पड़ा है। आज तकनीक की दुनिया में जब लगभग सब कुछ इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के इर्द-गिर्द घूमता है, ऐसे समय में इन माइक्रोचिप्स के महत्त्व को कम नहीं आंका जा सकता है। इस चिप के बिना स्मार्टफोन, रेडियो, टीवी, लैपटॉप, कंप्यूटर या यहां तक कि उन्नत चिकित्सा उपकरण भी नहीं बन सकते हैं। भारत में अर्द्धचालकों की खपत वर्ष 2026 तक 80 बिलियन अमेरिकी डॉलर और वर्ष 2030 तक 110 बिलियन अमेरिकी डॉलर को पार करने की उम्मीद है। दुनिया में कुछ ही देश हैं जो इस चिप का निर्माण करते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, ताइवान, दक्षिण कोरिया, जापान और नीदरलैंड इसके अग्रणी निर्माता और निर्यातक हैं। अतः भारत को भी इस अवसर का ज़्यादा से ज़्यादा लाभ उठाना चाहिये।

 


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