जानिये ओलंपिक खेलों के इन द्रोणाचार्यों के बारे में, जिन्होंने पहुंचाया भारत को बुलंदियों पर

टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympic) में जहां एक तरफ भारतीय खिलाड़ी पूरे विश्व को अपने प्रदर्शन का लोहा मनवा रहे थे, तो वहीं उनसे कुछ ही मीटर की दूरी पर बैठे उनके कोच यानि की खेलगुरु उनका उत्साहवर्धन कर रहे थे। ये इन सभी कोचों की वर्षों की मेहनत और कठिन परिश्रम का फल है कि भारत ने टोक्यो ओलंपिक में 1 गोल्ड, 2 सिल्वर और 4 ब्रॉन्ज समेत कुल सात पदक जीते। इन सभी खिलाड़ियों का भारत लौटने पर जोरो शोरों से स्वागत किया गया। स्वयं खेलमंत्री अनुराग ठाकुर ने इनके सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य देशवासियों में खेल को प्रोत्साहन देना था।

1) काम आई AFI, बार्टोनिट्ज और उवे होन की मेहनत

टोक्यो ओलम्पिक के आखिरी दिन भारतीय एथलीट नीरज चोपड़ा ने भाला फेंक प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता। उनकी इस सफलता का श्रेय उनके कोच डॉ क्लाउस बार्टोनिट्ज (बायोमैकेनिकल विशेषज्ञ) और उवे होन (प्रमुख कोच) को भी जाता है, जिन्होंने न सिर्फ नीरज को ट्रेनिंग दी, बल्कि ओलंपिक जैसे विश्व स्तरीय खेलों में गोल्ड मेडल जिताने में अहम भूमिका अदा की। नीरज की इस सफलता का श्रेय एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया को भी जाता है, जिन्होंने जनवरी 2020 में दक्षिण अफ्रीका के पोटचेफस्ट्रूम में आयोजित होने वाली एथलेटिक्स सेंट्रल नॉर्थ ईस्ट मीटिंग से पहले नीरज की मदद करने के लिए बार्टोनिट्ज़ की ओर रुख किया। चूंकि यह एक ओलंपिक क्वालिफिकेशन इवेंट था, ऐसे में नीरज को और अच्छे मार्गदर्शन की जरूरत थी।

जानकारी के लिए बता दें कि उवे होन के प्रशिक्षण में नीरज ने(2018) एशियाई खेलों और (2018) राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण जीता और राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया था।

नीरज को ट्रेनिंग देने वाले दिग्गज जर्मन थ्रोअर उने हॉन इकलौते ऐसे थ्रोअर हैं, जिन्होंने 100 मीटर की दूरी तक जेवलीन को फेंका है। वर्ष 1984 में हॉन ने 104.8 मीटर की दूरी तक भाला फेंक कर वर्ल्ड रिकॉर्ड कायम किया था। हालांकि हॉन ने यह रिकॉर्ड पुराने भाले के साथ कायम किया था। 1996 में उन्होंने 98.48 मीटर की दूरी तक भाला फेंक कर नए भाले की श्रेणी में विश्व रिकॉर्ड बनाया था।

2) विजय शर्मा के मार्गदर्शन में निखरीं मीराबाई चानू

टोक्यो ओलंपिक में रजत पदक विजेता मीराबाई चानू ने अपना प्रशिक्षण, मुख्य राष्ट्रीय कोच विजय शर्मा के मार्गदर्शन में किया। विजय शर्मा पिछले कई वर्षों से मुख्य राष्ट्रीय कोच हैं और उन्होंने मीराबाई का कार्यभार तब संभाला, जब वह 2014 में राष्ट्रमंडल खेलों से ठीक पहले राष्ट्रीय चैंपियन बनीं। यह विजय शर्मा की मेहनत का नतीजा है, जिसके बूते मीराबाई को राष्ट्रमंडल खेल, विश्व चैंपियनशिप और एशियाई खेलों में पदक जीतने में सफलता मिली है। विजय शर्मा ने रियो डी जनेरियो में अपने तीन प्रयासों को विफल करने के बाद भी मीराबाई को वापस पटरी पर लाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। विजय शर्मा को कोचिंग के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाओं के लिए वर्ष 2018 में द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

3) ग्राहम रीड की एंट्री और हॉकी में 41 साल बाद मेडल

जर्मनी को हराकर 41 साल बाद ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय पुरुष हॉकी टीम के ऑस्ट्रेलियाई कोच ग्राहम रीड बार्सिलोना ओलंपिक 1992 में रजत पदक जीतने वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम का हिस्सा रहे हैं। रीड वर्ष 2019 में भारत के कोच बने थे। उन्होंने ओलिंपिक जैसे मंच पर अच्छे नतीजे के लिए प्रक्रिया और युवाओं पर विश्वास पर हमेशा जोर दिया। 2016 रियो ओलम्पिक में ग्राहम रीड ऑस्ट्रेलियाई हॉकी टीम के कोच थे।

4) पार्क ताए-सांग ने बनाया सिंधु को ऑल-राउंडर

भारतीय बैडमिंटन सनसनी पीवी सिंधु ने दक्षिण कोरियाई कोच पार्क ताए-सांग के मार्गदर्शन में टोक्यो में कांस्य पदक जीता। पार्क ने सिंधु को एक ऑलराउंडर खिलाड़ी बनाने के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दक्षिण कोरिया के बुसान में वर्ष 2002 में आयोजित एशियाई खेलों में पुरुषों की टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक विजेता, पार्क ने सिंधु को उनका डिफेंस और नेटप्ले में सुधार करने में मदद की।

इन्होने सिंधु को अपने भ्रामक नेट ड्रिब्ल्स के साथ अकाने यामागुची (जापान), ही बिंगजियाओ (चीन) और मिया ब्लिचफेल्ड (डेनमार्क) जैसे शीर्ष खिलाड़ियों को मात देने में सक्षम बनाया। दरअसल पार्क को मुख्य कोच पी. गोपीचंद वर्ष 2019 में पुरुषों की टीम को प्रशिक्षित करने के लिए लाये थे, लेकिन जल्द ही वह सिंधु के कोचिंग स्टाफ का हिस्सा बन गए।

सिंधु को सुपरस्टार बनाने में दिग्गज भारतीय शटलर पुलेला गोपीचंद की भी बड़ी भूमिका रही है। उन्होंने सिंधु को शुरुआती दौर में बैडमिंटन के ऐसे गुर सिखाए जिसके बाद सिंधु लगातार बुलंदी पर पहुंचती चली गईं।

5) राफेल बर्गमास्को की हाई परफोर्मिंग कोचिंग का नतीजा है लवलीना का मेडल

इटली के रैफेल बर्गमास्को ने लवलीना को टोक्यो 2020 में शानदार प्रदर्शन का विश्वास दिलाया। हाई परफोर्मिंग डायरेक्टर के तहत काम करने वाले महिला मुक्केबाजी टीम के मुख्य कोच ने महिलाओं की वेल्टरवेट मुक्केबाजी में लवलीना बोरगोहेन को कांस्य पदक जिताने में अहम भूमिका निभाई है। बर्गमास्को पांच बार के राष्ट्रीय चैम्पियन रह चुके हैं और वह कोच के रूप में बीजिंग, लंदन और रियो ओलंपिक में भाग ले चुके थे।

बर्गामास्को वर्ष 2001 से भारतीय टीमों के विभिन्न स्क्वॉड के साथ जुड़े हैं, लेकिन 2016 रियो ओलंपिक के बाद उसका अनुबंध नवीनीकृत नहीं किया गया था। वर्ष 2017 में वह फिर भारतीय टीम से जुड़े और उन्हें सीनियर महिला खिलाड़ियों का हाई परफॉर्मेंस डायरेटक्टर नियुक्त किया गया। लवलीना ने जिस तरह से आक्रामक शुरुआत की और टोक्यो में खुले दिमाग और फुर्ती से खेलीं, उसका श्रेय बर्गामास्को को ही जाता है।

भारतीय महिला बॉक्सिंग टीम के मुख्य कोच शिव सिंह और कोच पद्म बोरो ने भी लवलीना को बॉक्सिंग की बारीकियां सिखाईं हैं। इन दोनों कोचों के अलावा लवलीना ने मोहम्मद अली कमर की देखरेख में भी कुछ समय ट्रेनिंग की है।

6) बेंटिनिडिस और बजरंग की जोड़ी ने जिताया पदक

कुश्ती में भारतीय दिग्गज रेसलर बजरंग पूनिया ने कांस्य पदक जीता। 65 किग्रा वर्ग में शीर्ष पहलवानों में से एक बनने के लिए बजरंग का उदय तब हुआ, जब शाको बेंटिनिडिस ने बागडोर संभाली। बेंटिनिडिस की अगुवाई में बजरंग पूनिया वर्ल्ड चैंपियन बने। बेंटिनिडिस ने बजरंग की गति को सुधारा और उन्हें अधिक आक्रामक बनाया। बेंटिनिडिस ने पूनिया को कुश्ती के दांव पेच की बारीकियां सिखा कर विरोधियों को चित करने की कला में माहिर बनाया। जॉर्जिया के फ्री स्टाइल पहलवान बेंटिनिडिस ने वर्ष 2000 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में जॉर्जिया का प्रतिनिधित्व किया था।

16 अगस्त 1975 को जन्मे बेंटिनिडिस ने 2004 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में ग्रीस की ओर से हिस्सा लिया था। वर्ष 2008 के ओलंपिक में 74 किलोग्राम भार वर्ग में भी उन्होंने हिस्सा लिया था।

7) दहिया को निखारने में कई कोचों की भूमिका

टोक्यो ओलंपिक के दौरान पहलवान रवि दहिया ने अपने धमाकेदार प्रदर्शन से फाइनल में हर किसी को चौंका दिया। अपने पहले ही ओलंपिक में दहिया ने फाइनल में जगह बनाई। दहिया कुश्ती में भारत के लिए रजत पदक जीतने वाले दूसरे पहलवान हैं। उनसे पहले सुशील कुमार ने 2012 के लंदन ओलंपिक में भारत के लिए रजत पदक जीता था।

रवि को इस मुकाम तक पहुंचाने में उनके कई कोचों की बड़ी भूमिका रही है। उनकी कामयाबी के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके साथ ही उनके कोच अनिल मान से फोन पर बातचीत करके उन्हें बधाई दी। हालांकि इसके पहले रवि दहिया ने दूसरे कोचों से भी कुश्ती की बारीकियां सीखी हैं।

रवि को इस मुकाम तक पहुंचाने में जगमेंद्र सिंह और राजीव तोमर और महाबली सतपाल का महत्वपूर्ण योगदान है। रवि के ये दोनों कोच (जगमेंद्र सिंह और राजीव तोमर) खुद भी ओलंपियन रह चुके हैं। अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने रवि दहिया को कुश्ती के दांवपेच सिखाए हैं। मुजफ्फरनगर के रहने वाले जगमेद्र सिंह ने 1984 के लॉस एंजिल्स के ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया था, जबकि बागपत के राजीव तोमर ने वर्ष 2008 में बीजिंग ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व किया था। रवि दहिया ने कुछ समय तक महाबली सतपाल से भी कुश्ती के दांव सीखे हैं।

टोक्यो ओलम्पिक में दहिया की जिम्मेदारी कमाल मलिकोव को अप्रैल 2021 से टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम के तहत दी गई थी। कमाल मलिकोव को टोक्यो ओलम्पिक की तैयारी के लिए बतौर फिटनेस ट्रेनर लाया गया था।

-PBNS


More Related Posts

Scroll to Top