20 अगस्त 2021 को मालाबार विद्रोह जिसे मोपला विद्रोह (Moplah rebellion) या मुस्लिम विद्रोह या दंगे (Moplah Massacre) भी कहते हैं, को 100 साल पूरे हो गए। जिस मोपला (मुस्लिम) दंगे में हजारों हिंदुओं का नरसंहार हुआ था, वह एक बार फिर से चर्चा में है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (Indian Council of Historical Research) ICHR ने मोपला विद्रोह में मारे गए मोपला विद्रोह का नेतृत्व करने वाले वरियम कुननाथ कुनहमीद हाजी एवं अली मुसलिअर के साथ 387 अन्य नामों को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों की सूची से हटाने का निर्णय लिया है।
इस संबंध में आईसीएचआर में एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची कि मोपला विद्रोह कोई स्वतंत्रता आंदोलन नहीं था। बल्कि वह एक मुस्लिम धार्मिक अतिवादी आंदोलन था जिसके कारण बड़े स्तर पर धर्म परिवर्तन हुए।
आईसीएचआर की समिति का कहना है कि मोपला विद्रोह का उद्देश्य खलीफा (Caliphate) यानी मुस्लिम धार्मिक शासन स्थापित करना था। अगर विद्रोही अपने उद्देश्य में सफल हो जाते तो वह क्षेत्र भारत के हाथ से निकल जाता। समिति का कहना है कि उस मोपला विद्रोह के बाद शरिया अदालतों की स्थापना हुई तथा बड़ी संख्या में हिंदुओं का नरसंहार हुआ था।
इसी मोपला विद्रोह को लेकर पिछले सप्ताह उस वक्त जबरदस्त विवाद हो गया जब केरल विधानसभा के अध्यक्ष एमबी राजेश ने मोपला नरसंहार का नेतृत्व करने वाले हाजी की तुलना भगत सिंह से कर दी।
भाजपा ने इस पर कड़ा विरोध जताया। भारतीय जनता पार्टी के पूर्व महासचिव राम माधव ने कहा कि 1921 में हुआ मोपला विद्रोह भारत में तालिबानी सोच की पहली अभिव्यक्ति थी। जिसे केरल की कम्युनिस्ट सरकार कम्युनिस्ट क्रांति के रूप में मना रही है।
आइए जानते हैं क्या है मोपला विद्रोह?
आज से 100 साल पहले 20 अगस्त 1921 को मद्रास प्रेसिडेंसी के मालाबार क्षेत्र में मालाबार विद्रोह शुरू हुआ था। इस हथियारबंद विद्रोह को मोपला विद्रोह या मुस्लिम विद्रोह या मुस्लिम दंगे के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान में यह क्षेत्र उत्तर केरल के मल्लापुरम जिला में पड़ता है।
कई महीने तक चले इस नरसंहार में 10000 से ज्यादा लोग मारे गए। जिसमें 2339 विद्रोही तथा बाकी हिंदू थे। इस विद्रोह में बड़े स्तर पर हिंदुओं का नरसंहार हुआ। बहुत बड़े स्तर पर जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया और उन्हें मुस्लिम बनाया गया।
जब यह सब हो रहा था तब उस वक्त कांग्रेस पार्टी द्वारा इसकी निंदा करने के बजाए इसको देश की स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने की कोशिश की गई। इसे किसान आंदोलन बताया गया। महात्मा गांधी ने भी इसकी निंदा नहीं की। कांग्रेस पार्टी इसके जरिए मुस्लिम समाज का तुष्टिकरण एवं मुस्लिम लीग को खुश कर उसे स्वतंत्रता आंदोलन में अपने साथ जोड़ना चाहती थी।
डॉक्टर बी आर अंबेडकर ने मोपला विद्रोह को हिंदुओं का नरसंहार बताया था। लेकिन महात्मा गांधी ने इसके लिए एक तरह से हिंदुओं को ही दोषी ठहराया था। यह आप जेएनयू के प्रोफ़ेसर आनंद रंगनाथन के इस ट्वीट मैं पढ़ सकते हैं।
Some of Mahatma Gandhi's views in the aftermath of the Moplah Riots that, in the words of Dr Ambedkar were "INDESCRIBABLE blood-curdling ATROCITIES committed by the Moplahs against the Hindus."
— Anand Ranganathan (@ARanganathan72) October 5, 2018
Disturbing to say the least. For more details, please read: https://t.co/ezErS9il7N pic.twitter.com/cAnn5vDDpT
मोपला नरसंहार उसी दौरान हुआ जब देश में खिलाफत आंदोलन चल रहा था। 1919 से 1922 के बीच देश में खिलाफत आंदोलन चला था। जो विशुद्ध रूप से मुस्लिम धार्मिक सत्ता स्थापित करने का आंदोलन था। खिलाफत आंदोलन का भारत एवं भारत की स्वतंत्रता से कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन कांग्रेस पार्टी एवं महात्मा गाँधी ने इसका समर्थन किया था। खिलाफत आंदोलन की शुरुआत ऑटोमन साम्राज्य के खलीफा को प्रथम विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजो द्वारा पद मुक्त किये जाने के कारण शुरू हुआ था। तथा उस आंदोलन की मुख्य मांग थी ऑटोमन साम्राज्य के खलीफा को दुबारा बहाल करना। खलीफा या कैलीफेट का मतलब होता है मुस्लिम धार्मिक शासन।
मोपला विद्रोह भी इसी खिलाफत आंदोलन के दौरान हुआ था। देश में मोपला विद्रोह को एक राष्ट्रवादी आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई। 1971 में केरल की सरकार ने विद्रोह में भाग लेने वालों को स्वतंत्रता सेनानियो की सूची में शामिल कर लिया।
मोपला विद्रोह क्या था इसको लेकर इतिहासकारों में भी एक राय नहीं है तथा उनके बीच भारी मतभेद है। कुछ इतिहासकार इसे स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा मानते हैं, कुछ मुस्लिम धार्मिक विद्रोह तो कुछ इसे हिंदू नरसंहार मानते हैं।
इस संबंध में भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि इतिहास को तोड़ा मरोड़ा गया है। यह केरल में हिंदुओं का पहला जेहादी नरसंहार था। यह विद्रोह खिलाफत आंदोलन के हिस्सा के रूप में शुरू हुआ तथा हिंदुओं के नरसंहार के रूप में समाप्त हुआ। इस विद्रोह के दौरान बड़ी संख्या में हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम बनाया गया। भाजपा एवं संघ परिवार का कहना है कि बिना उकसावे के हिंदुओं के नरसंहार को स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बताना इतिहास के साथ साथ केरल के बहुसंख्यक समाज का भी अपमान है।