भारत में दवाइयों के ख़राब स्टोरेज की वजह से आम जनता को जान-माल की अपूर्णनीय क्षति हो रही है। भारत में कोरोना की वजह से लाखों लोग मर गए और लाखो परिवार बर्बाद हो गए। ब्लैक फंगस वायरस ने भी कई ज़िंदगियाँ तबाह कर दी। कोरोना के इलाज के लिए स्टेरॉइड्स का बेजां इस्तेमाल किया गया और कहते हैं कि इसकी वजह से ब्लैक फंगस और ज्यादा फ़ैल गया।
यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि सारे विश्व में कोरोना हुआ पर कहीं से भी ब्लैक फंगस की शिकायत नहीं आई। Neetipost ने इन बीमारियों की पड़ताल की तो पाया कि स्टेरॉइड्स का इस्तेमाल उन मरीज़ों पर किया गया जिन पर जीवन रक्षक दवाई असर नहीं कर रही थी। अब सवाल उठता हैं कि आखिर जीवन रक्षक दवाइयां असर क्यों नहीं कर रही थी? इस सवाल का जवाब पाने के लिए हमने 'सेरी" ट्रस्ट के मैनेजिंग डायरेक्टर शुभकांत से बात की। पढ़िए.साक्षात्कार के चुनिंदा अंश :
दवाइयों की स्टोरेज कितना महत्वपूर्ण विषय है?
जिस तरह से भोजन को सही तरह से सही तापमान पर स्टोर करना अनिवार्य है, उसी तरह जीवन रक्षक दवाइयों की स्टोरज अनिवार्य है।
यदि दवाइयों को लेबल पर इंगित तापमान पर स्टोर नहीं किया जाता तो उसके क्या दुष्परिणाम होते हैं?
जिस प्रकार दूध को सही तापमान पर स्टोर नहीं किया जाए तो वह फट जाता है, उसी प्रकार जीवन रक्षक दवाइयों की भी गुणवत्ता कम या समाप्त हो जाती है। और, इतना ही नहीं, बल्कि दवाइयां टॉक्सिक भी हो जाती हैं। इसकी वजह से मरीज़ व उनके परिजनों को जान-माल दोनों का नुकसान हो सकता है। दवाइयों के स्टोरेज के साथ उनका ट्रांसपोर्टेशन भी उल्लिखित तापमान पर ही होना चाहिए।
जीवन रक्षक दवाइयों की गुणवत्ता कम होने से क्या हो सकता है?
कम गुणवत्ता की दवाई से मरीज़ का समय पर उपचार नहीं हो पाता है और बीमारी बढ़ती जाती है। साथ ही, आर्थिक नुकसान तो होता ही है। जिस मामूली सी खांसी-ज़ुकाम का इलाज सही गुणवत्ता वाली दवा से ३-५ दिन में हो सकता है, अब देखा गया है कि मरीज़ को १०-१५ दिन या उससे भी अधिक हो जाते हैं, पर मर्ज़ का पूरा इलाज नहीं हो पाता। नतीजा यह है कि अधिक मात्रा में गुणवत्ता रहित या कम गुणवत्ता की एंटीबायोटिक व अन्य दवाई खाने से इम्युनिटी कम होती जाती है, एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस उत्पन्न होता है और आर्थिक नुकसान भी होता है।
कितनी दवाइयां किस तापमान पर स्टोर करनी चाहिए?
लगभग एक प्रतिशत दवाई ३० डिग्री से कम, १२-१५ प्रतिशत २-८ डिग्री पर और ८५% दवाई २५ डिग्री से कम तापमान पर स्टोर करना अनिवार्य है।
आम नागरिक को कैसे पता चलेगा कि कौन सी दवाई किस तापमान पर स्टोर होना चाहिए?
हर दवाई के लेबल पर स्टोरेज का पूर्ण विवरण होता हैं, दवाई खरीदने से पहले उसे पढ़ना चाहिए।
दिल्ली में या भारत के अन्य राज्यों में काफी कम दवाई की दुकानें शीशे में बंद हैं या उनमें वातानुकूलन है तो फिर उचित तापमान पर दवाई कैसे स्टोर किया जाएगा?
देखिये, दिल्ली में तो २४ घंटे बिजली उपलब्ध है तो यहाँ तो हर दुकान के शटर वाले हिस्से में शीशे के फ्रेम लगाकर और AC -कूलर लगाकर दवाइयों को तय तापमान पर स्टोर किया जा सकता है। और, ये सारे देश में एक मिसाल होगी। साथ ही, दवाइयों का ट्रांसपोर्टेशन भी कोल्ड चेन के साथ ही होना चाहिए।
दिल्ली व अधिकांश भारत में ४०-४५ डिग्री तक गर्मी होती है, अब दुकान में कितना तापमान है यह कैसे पता चलेगा?
सरकार को कानून बनाना होगा कि हर दवाई दुकानदार व थोक विक्रेता अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान पर रूम थर्मामीटर लगाए जिसे ग्राहक भी देख सके और इससे पता चल जाएगा कि दुकान का तापमान कितना है। यदि तापमान ३० डिग्री से ऊपर हैं तो ग्राहक स्वयं ही उस दुकान से दवाई नहीं खरीदेंगे या उस दुकान पर ड्रग कण्ट्रोल विभाग उचित क़ानूनी कार्रवाई करेगी।
लगभग कितने केमिस्ट होंगे जो दवाइयों को सही तरह से स्टोर नहीं करते?
वर्तमान में ८५-९० % केमिस्ट दुकानदार काउंटर को शटर के बाहर लगाकर दवा सेल एवं स्टोर करते हैं जो कि ड्रग्स एंड कास्मेटिक एक्ट १९४० के तहत मिले ड्रग लाइसेंस का उल्लंघन तो है ही साथ ही, इसकी वजह से जीवन रक्षक दवाइयां गुणवत्ता रहित और टॉक्सिक हो जाती हैं।
दिल्ली नगर निगम व अन्य विभाग अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करते?
ये सिर्फ अतिक्रमण का विषय नहीं हैं, अतिक्रमण तो बहुत ही छोटा विषय है। इस समस्या के सामने, बल्कि मैं तो कहूंगा की केमिस्ट दुकानदारों द्वारा अतिक्रमण करके आम जनता की जान को खतरे में डालने का विषय है। यदि केमिस्ट अतिक्रमण न करें तो उसकी दुकान शीशे में पैक्ड होगी, जिसकी वजह से जीवन रक्षक दवाइयां धूल रहित वातावरण में requisite temperature as labelled पर ही थ्रू आउट शेल्फ लाइफ स्टोर होंगी। जिसकी वजह से गुणवत्तायुक्त दवाई का सेवन करके मरीज़ समय पर स्वस्थ होगा और उसके पैसे भी कम खर्च होंगे।
कोरोना में भी दवाइयों की ख़राब स्टोरेज की वजह से क्या मरीज़ समय पर रिकवर नहीं हो पाए और फिर उनकी जान बचाने के लिए स्टेरॉइड्स देना पड़ा?
हो सकता है, इस संभावना को कोई नकार नहीं सकता। न सिर्फ कोरोना बल्कि हर बीमारी में अधिकांश मरीज़ो पर जीवन रक्षक दवाइयां as expected by डॉक्टर असर नहीं करती, पर उन बीमारियों से एकदम से मरीज़ की जान नहीं गई या मरीज़ अंतिम सांसें नहीं गिनता, इसीलिए स्ट्रोइड्स नहीं दी गई या कम मात्रा में दी गई लेकिन कोरोना में शुरुआत के ५-६ दिन में यदि बीमारी काबू में नहीं आई तो स्टेरॉइड्स देना पड़ा। इसकी वजह से कई मरीज़ों के डायबिटिक लेवल बहुत हाई हो गए और वो मर गए या उन्हें ब्लैक फंगस इन्फेक्शन हो गया।
यह बात इतने पुख्ता तौर पर आप कैसे कह सकते हैं?
सारे विश्व में कोरोना हुआ पर क्या वहां से ब्लैक फंगस की खबर आई? नहीं न, और अगर कहीं होगा तो बहुत कम होगा। विश्व स्वस्थ संगठन के अनुसार दवाइयों की स्टोरेज बाकी देशों के मुकाबले भारत में सबसे घटिया है। यह भी सत्य है कि कोरोना का प्रोटोकॉल ट्रीटमेंट का अमेरिका, यूरोप और भारत में एक सामान है फिर भारत में ही क्यों इतनी मौतें हुईं या ब्लैक फंगस हुआ? इसकी वजह यही है कि जो दवा बाकी देशों में असर कर रही थी वो हमारे देश में कम असर कर पा रही थी क्योंकि ८५ प्रतिशत केमिस्ट उन दवाइयों को सही तापमान पर स्टोर ही नहीं कर रहे थे। तो, गुणवत्तारहित दवा देने से तो मरीज़ का इलाज संभव नहीं है।
इस समस्या के समाधान के लिए अब सरकारें क्या करें?
केंद्र सरकार और राज्य सरकार संकल्पित हों कि देश में स्टोरेज ऑफ़ मेडिसिन की समस्या को जड़ से समाप्त कर देंगे। सभी सरकार बेहतरीन हॉस्पिटल दे सकते हैं, आधुनिक मशीन और ऑक्सीजन की व्यवस्था कर सकते हैं, डॉक्टर और हेल्थ वर्कर्स की वयवस्था कर सकते हैं पर यदि दवा गुणवत्ता रहित या inefficacious या टॉक्सिक मिली तो मरीज़ को कोई नहीं बचा पाएगा। इसीलिए, जिस तरह से नकली दवा बेचने वालों पर कार्रवाई होती है, उसी प्रकार देश की राजधानी दिल्ली व अन्य राज्यों में जीवन रक्षक दवाइयों को ख़राब तरह से स्टोर करने वाले रिटेल व थोक विक्रेता एवं निर्माताओं पर ड्रग्स एंड कास्मेटिक एक्ट १९४० के उल्लंघन करने पर उचित कार्रवाई होनी चाहिए। यदि कोई न माने तो उसका ड्रग लाइसेंस रद्द कर देना चाहिए।
सवाल : क्या यह संभव है?
क्यों नहीं, सरकार जनता की जान-माल की रक्षा के लिए संकल्पित हैं। अभी तक किसी ने भी इस विषय पर नहीं सोचा लेकिन जैसे शुद्ध भोजन, जल, वायु हमारे लिए जितना उपयोगी हैं उतनी ही उपयोगी हमारे लिए जीवन रक्षक दवाइयों की गुणवत्ता। वर्तमान में अनाज, फल, सब्ज़ी व अन्य खाद्य पदार्थ में मिलावट है या पेस्टिसाइड की मात्रा अधिक है। साथ ही, जल और वायु दोनों ही प्रदूषित हैं। अब कोई व्यक्ति बीमार पड़े तो उसे सिर्फ जीवन रक्षक दवाएं ही बचा सकती हैं। अगर वो भी गुणवत्ताहीन हैं तो इंसानी जान को कैसे बचाएंगे? अब जनता को जागरूक होकर दवाइयां खरीदनी होगी जो दुकानें दवा के स्टोरेज पर ध्यान नहीं दे रहीं तो जनता उनका बहिष्कार करें और सरकार क़ानूनी कार्रवाई करें। सब चलता है... वाला attitude अब नहीं चलेगा।
आपकी संस्था ने bad स्टोरेज ऑफ़ लाइफ सेविंग ड्रग्स पर कभी स्वास्थ्य विभाग या ड्रग कण्ट्रोल डिपार्टमेंट को शिकायत की?
हाँ, हमारी संस्था ने CDSCO एवं दिल्ली ड्रग कण्ट्रोल डिपार्टमेंट को सन् २०१८ में ही शिकायत करके विस्तृत जानकारी दी थी। हमारी संस्था द्वारा साझा की गई जानकारी को CDSCO ने भी माना और लोकसभा की सबऑर्डिनेट समिति को बताया कि यदि दवा को उचित तापमान पर स्टोर न किया जाए तो वो INEFFICACIOUS तो होती ही हैं, साथ ही टॉक्सिक भी हो जाती हैं। अब सरकार उचित कार्रवाई नहीं करेंगी तो हमें इंसानी ज़िन्दगियों की रक्षा के लिए न्यायालय से गुहार लगनी पड़ेगी।
CDSCO के द्वारा प्राप्त उत्तर की कॉपी आपके माध्यम से सभी देशवासियों तक पहुंचाने का निवेदन करता हूं। CDSCO के द्वारा प्राप्त उत्तर को पूरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।