बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) द्वारा किया गया केंद्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार एवं फेरबदल साधारण नहीं है| यह असामान्य एवं अभूतपूर्व है| यह ऐसा है मानो जैसे प्रधानमंत्री सब कुछ बदल देने पर आमादा हो।
ऐसा पहली बार है की जब किसी मंत्रिमंडल के विस्तार एवं फेरबदल में इतने बड़े स्तर पर सरकार के इतने वरिष्ठ मंत्रियों का इस्तीफा लिया गया हो। जो मंत्री कल तक सरकार का चेहरा थे अचानक और अप्रत्याशित तरीके से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा किये गये इस विस्तार का स्पष्ट संकेत एवं संदेश है की जो प्रदर्शन नहीं करेगा वह दंडित होगा।
इससे यह भी संदेश गया कि प्रधानमंत्री का कान जमीन से लगा हुआ है और जनता की आवाज उन तक पहुंच रही है। जिन जिन मंत्रियों के प्रति जनता में नाराजगी थी, जिन मंत्रियों की सोशल मीडिया पर बैंड बजी| विशेषकर भाजपा समर्थकों द्वारा जिन जिन मंत्रियों की खिंचाई की गई सबकी मंत्रिमंडल से छुट्टी कर दी गई है। बाहर किये गए मंत्रियों में प्रकाश जावड़ेकर (Prakash Javadekar) एवं रविशंकर प्रसाद (Ravi Shankar Prashad) सबसे बड़े नाम है| वह सरकार का चेहरा थे| सरकार के हर फैसले को मीडिया में आ करके बताते थे। लेकिन भाजपा के कट्टर समर्थको के गुस्से का सबसे ज्यादा सामना भी इन्हें ही करना पड़ा| इन दोनों मंत्रियों को सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थकों एवं हिंदुत्ववादी, जो भाजपा के मूल समर्थक है, के नाराजगी का खामियाजा भुगतना पड़ा है।
प्रकाश जावड़ेकर मीडिया में सरकार की नैरेटिव आगे लाने में नाकाम रहे। सुचना प्रसारण मंत्री के रूप में उनका दायित्व था कि सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाएं लेकिन वह ऐसा करने में नाकाम रहे। जब सरकार पर चारों तरफ से हमले हो रहे थे तब यह प्रकाश जावड़ेकर का दायित्व था कि वह आगे आकर के उन हमलों का जवाब देते| फेक न्यूज़ को रोकते| लेकिन वह ऐसा कुछ भी करने में असफल रहे। OTT पर हिन्दू समाज एवं सरकार पर हो रहे हमले को भी रोकने में नाकाम रहे| उनके मंत्रालय में नौकरशाही पूरी तरह से हावी रही। प्रकाश जावड़ेकर काम कर के दिखाने के बजाय सिर्फ बयान तक सिमट कर रह गए।
वही रविशंकर प्रसाद अपने दोनों ही मंत्रालय में असहाय से प्रतीत होने लगे थे। कानून मंत्री के रूप में उनका यह दायित्व था की सरकार के फैसलों को अदालती अडचनों से बचाएं| लेकिन पिछले कुछ समय में सरकार के हर फैसले को अदालत में चुनौती दी जाने लगी और सरकार कोर्ट में उलझी हुई नजर आई| सरकार के हर फैसले में अदालत हस्तक्षेप करती हुई नजर आई। न्यायिक सुधार पर सरकार की बड़ी-बड़ी बातें जैसे धरी की धरी रह गई| रविशंकर प्रसाद की कानून मंत्री के रूप में यह एक बहुत बड़ी नाकामी थी। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री के रूप में भी वह असहाय नजर आए। सोशल मीडिया विशेषकर ट्विटर के साथ हुआ उनका सार्वजानिक जुबानी जंग उन पर भारी पड़ा। ट्विटर ने सरकार की बात मानने से मना कर दिया यह सरकार की छवि के लिए बहुत ही नुकसान देय था। ट्विटर अपनी मनमानी करता रहा और रविशंकर प्रसाद कार्यवाई करने के बजाए सिर्फ बयान और धमकी देते रहे। इससे सरकार की छवि को बहुत ही नुकसान पहुंचा।
रविशंकर प्रसाद एवं प्रकाश जावड़ेकर की छवि कड़ी निंदा मंत्री के रूप में बन गई थी। जो कार्रवाई करने के बजाय जुबानी खानापूर्ति करते है।
वहीं डॉ हर्षवर्धन (Dr Harshvardhan) को कोरोना महामारी का खामियाजा भुगतना पड़ा। कोरोना की दूसरी लहर के लिए समय पर सतर्क ना हो पाना तथा टीकाकरण की स्पष्ट नीति ना होना डॉ हर्षवर्धन को भारी पड़ा।
शिक्षा मंत्री के रूप में डॉ रमेश पोखरियाल निशंक (Dr Ramesh Pokhariyal Nishank) कोई भी छाप छोड़ने में असफल रहे। ऐसा लगा जैसे शिक्षा मंत्रालय की अफसरशाही उनके ऊपर हावी हो। वह शिक्षा मंत्रालय में पार्टी तथा संघ की नीतियों को भी प्रमुखता के साथ लागू करने में असफल रहे।
बाबुल सुप्रियो (Babul Supriyo) को पश्चिम बंगाल चुनाव में प्रदर्शन भी पड़ा| उनका जाना उसी वक्त तय हो गया जब चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा के कार्यकर्ताओं पर हमले शुरू हुए तो बाबुल सुप्रियो ने कहा की वह इसलिए नहीं गए की उनकी गाड़ी पर भी हमला हो जाता| अपनी गाड़ी तो बचा ली लेकिन कुर्सी नही बचा पाए|
आगामी चुनावों को देखते हुए सरकार अपने दलित चेहरे एवं दलित राजनीति को एक नया रूप देना चाह रही थी। इसीलिए अब तक सरकार की सबसे बड़े दलित चेहरा रहे थावरचंद गहलोत के जगह पर लोकसभा के सबसे वरिष्ठ सांसदों में से एक वीरेंद्र कुमार को मंत्री बनाया गया है।
इस पूरे मंत्रिमंडल फेरबदल का स्पष्ट संदेश है कि जो मंत्री काम करने और अपनी बात जनता तक पहुंचाने में असफल होगा, उसकी कुर्सी जाएगी। जो विचारधारा से समझौता करेगा और जिससे पार्टी के मूल समर्थक नाराज होंगे उसकी कुर्सी जाएगी।
मोदी मंत्रिमंडल में वही मंत्री के रूप में रह सकता है जो प्रदर्शन करने, अपनी बात जनता तक पहुचने के साथ-साथ अपने विचारधारा पर अडिग हो और भाजपा एवं संघ के समर्थकों का विश्वास जीतने एवं खुश रखने में सफल हो।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण है गिरिराज सिंह, जिनका प्रदर्शन तो उस स्तर का नहीं है लेकिन उन्होंने कभी विचारधारा के साथ कोई समझौता नहीं किया| अपनी हिंदूवादी पहचान, विचारधारा एवं पार्टी की नीतियों को लेकर के वह बहुत ही आक्रामक रहते हैं। भाजपा एवं संघ समर्थकों के साथ साथ पूरा राइट विंग उनके पीछे चट्टान की तरह तरह खड़ा रहता है। जिसका परिणाम हुआ की मंत्रीमंडल विस्तार में वह प्रोन्नति पाने में सफल रहे।