1500 साल पुरानी, विलुप्त होती कला को संजोकर रख रहे हैं परशुराम आत्माराम गंगवाने

कला जगत में आजकल लोककलाओं के संरक्षण और उनके संवर्धन का विमर्श और लोक कला के विकास को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास हो रहे हैं। सरकार लगातार लोककलाओं के संरक्षण के लिए कार्य कर रही है। विलुप्त होती इन कलाओं को बचाने के लिए कई लोग स्वेच्छा से आगे आए हैं और काम कर रहे हैं। उन्हीं में से एक हैं परशुराम आत्माराम गंगवाने जिन्हें इस साल पद्म श्री पुरस्कार से नवाजा जाएगा। कठपुतली लोककला का इतिहास लगभग 1500 साल पुराना है और परशुराम इसी विरासत को सहेजने में लगे हैं।

परशुराम आत्माराम महाराष्ट्र के सिंधु दुर्ग जिले के एक छोटे से गांव पिंगुली के रहने वाले हैं। कठपुतली चलाने की कला में माहिर आत्माराम आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। उनकी कला का जादू ऐसा है कि अच्छे-अच्छे देखकर दंग रह जाएं।

पिछले 50 साल से भी अधिक समय से पुराने ठाकर आदिवासी 

आत्माराम गंगवाने पिछले 50 सालों से भी अधिक समय से पुराने ठाकर आदिवासी और लोककला के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। परशुराम आत्माराम गंगवाने ने कहा, "मैं अपने काम को पहचानने के लिए राज्य सरकार के आभारी हूं और पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए केंद्र सरकार का भी आभारी हूं। मुझे ठाकर आदिवासी और लोककला के संरक्षण के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी और लगभग 50 साल बाद मुझे अपने काम के लिए पहचाना गया। यह बहुत ही गर्व का पल है। मैं सरकार से अनुरोध करता हूं कि वह इस कला के संरक्षण पर ध्यान दे। ठाकर आदिवासी कला, आंगन आर्ट गैलरी और संग्रहालय में कला को देखने के लिए दुनियाभर से पर्यटक जिले में आ रहे हैं।"

मराठा योद्धा राजा छत्रपति शिवाजी के लिए काम करते थे परशुराम के पूर्वज

दरअसल, परशुराम आत्माराम गंगवाने के पूर्वज मराठा योद्धा राजा छत्रपति शिवाजी के लिए काम करते थे। वे रात में मनोरंजन के लिए चित्रकूट चित्रों और कठपुतली के माध्यम से कहानी सुनाते थे। विरासत में मिली इस लोककला को जीवित रखने के लिए परशुराम ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। इसके लिए उन्होंने गांव में जाकर ठाकर आदिवासी कला, आंगन आर्ट गैलरी और संग्रहालय की स्थापना की। आज ये आर्ट गैलरी और संग्रहालय न केवल देशी बल्कि विदेशी पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहती है।

संग्रहालय में ठाकर विरासत की कला के ग्यारह अलग-अलग रूपों को किया गया  प्रदर्शित

इस गैलरी और संग्रहालय में ठाकर विरासत की कला के ग्यारह अलग-अलग रूपों को प्रदर्शित किया गया है, जिसमें कलसूत्री यानी कठपुतली शो चित्रकाठी यानी पारम्परिक कहानियों का वर्णन करने वाली चित्रों की एक ऋंखला, पांगुल बैल यानी बैलों का खेल और शैडो पपेटरी शामिल हैं। सिर्फ इतना ही नहीं परशुराम ने अपने पास लगभग साढ़े तीन हजार पेंटिग्स का संरक्षण भी किया है। कला के संरक्षण के प्रति उनके इसी समर्पण को देखते हुए उन्हें इस साल पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है।

- इनपुट - PBNS


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