भाजपा द्वारा गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपानी को बदले जाने का राजनीतिक संदेश

शनिवार को दोपहर बाद अचानक खबर आई की गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपानी Vijay Rupani ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। यह सबके लिए चौकाने वाला खबर था। भाजपा गुजरात के मुख्यमंत्री को बदलने वाली है इसकी भनक किसी को नहीं थी। दो दिन से भाजपा संगठन महासचिव बी एल संतोष तथा गुजरात प्रभारी केन्द्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव दोनों गांधीनगर में थे लेकिन किसी को यह अनुमान नहीं था की वे मुख्यमंत्री को बदलने आये है।

अब प्रश्न यह है की आखिर चुनाव से एक साल पहले विजय रुपानी से इस्तीफा क्यों लिया गया? और इसका सन्देश क्या है क्यों भाजपा एक के बाद एक अपने मुख्यमंत्रियों को बदल रही है?

विजय रुपानी एक मृदुभाषी राजनेता रहे है तथा संगठन के आदमी माने जाते है। वह गृहमंत्री अमित शाह के काफी करीबी सहयोगी रहे है तथा उन्ही के चलते 2016 में उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया था। लेकिन 5 साल बाद चुनाव से ठीक एक साल पहले पार्टी ने उनका इस्तीफा ले लिया है। मुख्यमंत्री के रूप में लगातर विजय रुपानी की तुलना उनके पूर्वर्ती मुख्यमंत्री तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से होती रही और यही उनके खिलाफ गया। क्योंकि मुख्यमंत्री के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा खिची गयी रेखा के सामने विजय रुपानी बौने साबित हुए। प्रशासन पर भी रुपानी वह पकड़ बनाने में असफल रहे जो मोदी का था। इसका कार्यकर्त्ता एवं जनता में नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा था। करिश्माई छवि नही होने के कारण वह कार्यकर्ताओ में जोश पैदा नहीं कर पा रहे थे। इसके आलावा कोरोना की दूसरी लहर के दौरान भी सरकार की एक नकारात्मक छवि बनी।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भले ही दिल्ली में हो लेकिन गुजरात पर उनकी नजर लगातर बनी रहती है। गुजरात मॉडल की जो छवि उन्होंने बनाई थी उससे कोई समझौता उन्हें मंजूर नहीं है। रुपानी के कार्यकाल में उस गुजरात मॉडल की छवि धूमिल पड़ी थी। वैसे तो भाजपा एवं प्रधानमंत्री मोदी के लिए हर चुनाव ही महत्वपूर्ण होता है लेकिन गुजरात का चुनाव ज्यादा महत्वपूर्ण है। पार्टी ऐसी स्थिति में चुनाव में नहीं जाना चाहती थी जब कार्यकर्ताओ में पूरा जोश न हो। इसके आलावा गुजरात में पटेल यानि पाटीदार समाज भाजपा का मूल वोट बैंक रहा है लेकिन मोदी के हटने के बाद से पाटीदार समाज में एक उदासीनता की स्थिति पैदा हो गयी है। जिसे दूर करने के लिए ही भाजपा ने रुपानी को हटाकर पटेल समाज से सख्त छवि के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया है ताकि पाटीदारों में व्याप्त उदासीनता दूर करने के साथ ही कार्यकर्ताओ में जोश पैदा किया जा सके।  

विजय रुपानी ऐसे पांचवे मुख्यमंत्री है जिसे भाजपा ने इस साल बदला है। इससे पहले उत्तराखंड में त्रिवेन्द्र सिंह रावत एवं तीरथ सिंह रावत, असम में सर्वानन्द सोनोवाल, कर्नाटक में बी एस येदियुरप्पा को पार्टी बदल चुकी है। जिस सरलता के साथ और बिना किसी तमासा के ये बदलाव हुए है यह भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व की ताकत को भी प्रदर्शित करता है। साथ ही इससे यह भी साफ हो गया की गवर्नेंस के स्तर पर भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व को कोई समझौता मंजूर नहीं है। मुख्यमंत्रियों की जबाबदेही तय होगी। यातो प्रदर्शन करें या फिर अपनी कुर्सी छोड़ें।  

2014 के बाद भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने यह निर्णय लिया था की बीच कार्यकाल में मुख्यमंत्री को नहीं बदला जायेगा। तब पार्टी की सोच थी की इससे मुख्यमंत्री बिना चिंता एवं राजनीतिक दबाव के प्रशासन पर अपना ध्यान देंगे तथा एक अच्छा एवं स्वच्छ शासन देने के साथ साथ विकास को रफ़्तार देने में सफल होंगे। इसीलिए कार्यकर्ताओ के भारी विरोध के बाद भी पार्टी ने झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास को नहीं बदला। जिसका खामियाजा पार्टी को चुनाव में उठाना पड़ा।

पार्टी ने जिस उद्देश्य से बीच में मुख्यमंत्री नहीं बदलने का निर्णय लिया था परिणाम उसका उल्टा हुआ। पार्टी ने यह सोचा था की सरकार अच्छा प्रदर्शन करेगी और चुनाव जितना आसान होगा। लेकिन मुख्यमंत्री निरंकुश हो गये सबको साथ लेकर चलने के बजाय पार्टी में गुटबाजी बढ़ी। अपने स्तर पर चुनाव जितने के बजाय केन्द्रीय नेतृत्व पर आश्रित हो गये।

इस अनुभव के बाद पार्टी ने अपने निर्णय को बदल दिया जिसका परिणाम है की इस साल पांच मुख्यमंत्री बदले जा चुके है। अब मुख्यमंत्री को प्रदर्शन करना होगा चुनाव जितना होगा, नही तो जाना होगा।

 


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