भारत में जो भी मुसलमान या ईसाई हैं, वे यहीं के मूल निवासी हैं। उन्हें हिन्दू धर्म में वापस लाने का जो कार्य कभी स्वामी श्रद्धानंद ने किया था, श्री मोहन जोशी ने उसे ही संगठित रूप से आगे बढ़ाया।
मोहन जी का जन्म 13 दिसम्बर, 1934 को ग्राम खैराबाद (जिला कोटा, राजस्थान) में श्री रामगोपाल और श्रीमती रामकन्या बाई के घर में हुआ था। पारिवारिक आय का स्रोत खेती के साथ ही पुश्तैनी पूजा-पाठ था। कक्षा चार तक गांव में तथा कक्षा आठ तक रामगंज मंडी में पढ़कर वे कोटा आ गये। वहां से बी.ए. कर वे प्रचारक बन गये।
इनके गांव में प्रह्लाद दत्त वैद्य नामक युवक की ननिहाल थी। वह छुट्टियों में वहां आकर बच्चों को शाखा के खेल खिलाता था; पर विधिवत शाखा जाना तब प्रारम्भ हुआ, जब कक्षा पांच में पढ़ते समय चाचा जी इन्हें शाखा ले गये। मोहन जी ने तीनों संघ शिक्षा वर्ग प्रचारक बनने के बाद ही किये। प्रचारक बनने के बाद इन्होंने राजनीति शास्त्र में एम.ए. तथा साहित्य रत्न की उपाधि ली तथा रूसी भाषा का अध्ययन किया।
1957 में प्रचारक के नाते इन्हें सर्वप्रथम झालावाड़ जिले में भेजा गया। फिर 1960 से 1984 तक इनका केन्द्र जयपुर ही रहा। जनसंघ कार्यालय की देखभाल से लेकर 'अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद' के प्रांत संगठन मंत्री, आदर्श विद्या मंदिर के उपाध्यक्ष एवं प्रबन्धक, राजस्थान के सभी विद्यालयों की देखभाल, विवेकानंद केन्द्र, कन्याकुमारी के निर्माण हेतु धन संग्रह एवं उसका हिसाब-किताब, विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय मजदूर संघ आदि के कार्य विस्तार आदि में उन्होंने योगदान दिया; पर यह सब करते हुए जयपुर संघ कार्यालय प्रमुख और सायं शाखाओं का काम इनके साथ सदा जुड़ा रहा।
आपातकाल में मोहन जी ने जहां एक ओर सत्याग्रह के लिए युवकों को तैयार किया, वहां जेल में बंद लोगों के परिजनों से भी सम्पर्क बनाये रखा। आपातकाल के बाद इन्हें राजस्थान में विश्व हिन्दू परिषद का संगठन मंत्री बनाया गया। इस दौरान उन्होंने चौहान वंशीय हजारों मुसलमानों को परावर्तित किया, जो किसी कारण से मुसलमान हो गये थे। इससे ये विख्यात हो गये और कई पत्रों ने इस बारे में इनके साक्षात्कार तथा लेख प्रकाशित किये।
1984 में विश्व हिन्दू परिषद में 'परावर्तन विभाग' प्रारम्भ कर मोहन जी को उसका प्रमुख बनाया गया। इसे अब धर्म जागरण कहते हैं। मोहन जी ने देश में भ्रमण कर हजारों लोगों को वापस हिन्दू धर्म में आने को प्रेरित किया। हर प्रांत में समिति तथा सैकड़ों जिलों में संयोजक बनाये गये। मा. मोरोपंत पिंगले का आशीर्वाद सदा इनके साथ रहता था। राममंदिर आंदोलन तीव्र होने पर पर इन्हें बंगाल, असम और उड़ीसा में शिलापूजन का दायित्व भी दिया गया।
मोहन जी साहित्यिक रुचि के व्यक्ति हैं। छात्र जीवन में स्थानीय कवि सम्मेलन में ये प्रायः भाग लेते थे; पर प्रचारक बनने पर इधर से ध्यान हट गया। फिर भी चीन और पाकिस्तान के युद्ध के बाद इनकी कविताओं की पुस्तक ‘भारत की पुकार’ छपी, जिसके लिए काका हाथरसी और रक्षामंत्री श्री जगजीवन राम ने भी संदेश भेजे। दीनदयाल जी के देहांत पर इन्होंने व्यथित होकर एक ही रात में 51 कविताएं लिखीं। इन दिनों वे दीवाली और वर्ष प्रतिपदा पर एक नई कविता लिखकर अपने परिचितों को भेजते हैं।
सादगी की प्रतिमूर्ति मोहन जी ने समाज को जागरूक करने हेतु 15 पुस्तिकाओं का लेखन, संकलन और सम्पादन किया है। ईश्वर से प्रार्थना है वे स्वस्थ रहकर इसी प्रकार देश और धर्म के कार्य में सक्रिय रहें।