राजस्थान राज्य की राजनीति में हमेशा राजसी आन, बान और शान का बोलबाला रहा है। इसी परंपरा के तहत इस इलाके में महाराजा मान सिंह का नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। भरतपुर राजघराने के राजा मान सिंह का उस इलाके में भी खासा दबदबा था।
राजा मान सिंह का जन्म भरतपुर रियासत में 5 दिसम्बर 1921 को हुआ था। अपने पिता महाराजा किशन सिंह की चार संतानों में वह दूसरे पुत्र थे। अन्य तीन भाई महाराजा ब्रजेंद्र सिंह, गिरेन्द्र सिंह और गिर्राज सरन सिंह थे। इंग्लैंड में वर्ष 1928 से 1942 तक उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और फिर स्वदेश वापस लौटे। ब्रिटिश आर्मी में वह कैप्टन भी रहे। उनका विवाह 1945 में कोल्हापुर राज्य के कांगल ठिकाने की राजकुमारी अजय कौर से हुआ और उनकी तीन बेटियां हुईं। गजेंद्र कौर, प्रवीण कौर और दीपा उर्फ कृष्णेंद्र कौर। दीपा कौर उनकी तीन बेटियों में सबसे बड़ी हैं।
वर्ष 1946 से 1947 तक वह भरतपुर रियासत के मंत्री रहे। वर्ष 1947 में सभी रियासतों के स्वतंत्र भारत में विलय के बाद उन्होंने अपने किले से रियासत का झंडा उतारने का विरोध किया था। लेकिन, तब तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल के हस्तक्षेप के बाद दोनों झंडे लगाने पर सहमति बन गई।
आजादी के कई दशक गुजर जाने के बाद अब लोकतंत्र अपनी जड़ें मजबूत कर चुका था। भरतपुर रियासत राज परिवार के कुछ लोग राजनीति में कई दूसरे स्थानों से पदार्पण कर चुके थे। लेकिन, राजा मान सिंह ने भरतपुर को ही राजनीति के लिए चुना। वह वर्ष 1952 से ही लगातार सात बार कुम्हेर और डीग विधान सभा क्षेत्रों से निर्दलीय विधायक चुने गए। साल 1985 में राजनीतिक रंजिशों के चलते उनका पुलिस ने इंकाउंटर कर दिया। बाद में करीब 35 साल तक चले मुकदमे में 11 पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।