पश्चिम बंगाल की रक्तरंजित राजनीतिक इतिहास में ‘पार्टी सोसाइटी’ की भूमिका

बंगाल में रक्त रंजित राजनीति का पुराना इतिहास रहा है| पश्चिम बंगाल में वामपंथ के उभार के साथ ही हिंसा, हत्या, बंद, हड़ताल आम बात हो गई थी| राजनीतिक विरोधियो साथ हिंसा, हत्या इत्यादि राजनीति का सामान्य हिस्सा बन गया|

वामपंथ ने बंगाल की सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया| सारी सामाजिक संस्थाओं को खत्म कर दिया गया और उसका स्थान ले लिया वामपंथ की ‘पार्टी सोसाइटी’ (Party Society) ने|

आइए जानते हैं क्या है यह पार्टी सोसाइटी? यह कैसे अस्तित्व में आया? बंगाल की राजनीति में इसका क्या प्रभाव रहा है और क्या है बंगाल की रक्त रंजित राजनीति में पार्टी सोसाइटी की भूमिका?

बंगाल का राजनीतिक एवं सामाजिक इतिहास भारी रक्तपात से भरा पड़ा है| देश के अंदर नक्सल एवं माओवादी आंदोलन की शुरुआत पश्चिम बंगाल से ही हुई| 1967 में बंगाल की सिलीगुड़ी की नक्शलवाड़ी गांव से चारू मजूमदार एवं कानू सान्याल के नेतृत्व में हिंसक नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत हुई जो बाद में पूरे देश में फैल गया|

वामपंथ की उभार के साथ ही पश्चिम बंगाल में भयानक हिंसक सामाजिक संघर्ष हुए| लोगों की, विशेषकर तथाकथित जमींदारों की हत्याएं की गई| उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया गया| अपनी जान बचाने के लिए वह तथाकथित जमींदार गांव से भाग खड़े हुए| वामपंथ की नेतृत्व में हिंसा का नंगा खेल खेला गया| सामाजिक ताने-बाने छीन – भिन्न कर दिया गया| सामाजिक, धार्मिक एवं जातीय संस्थाएं खत्म हो गई और उसका स्थान लिया वामपंथी कार्यकर्ताओं एवं नेताओं को मिला करके बनाई गई एक समिति जिसे ‘पार्टी सोसाइटी’ के नाम से जाना गया| कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के इसी ‘पार्टी सोसाइटी’ के बल पर वामपंथ ने पश्चिम बंगाल में तीन दशक से ज्यादा शासन किया|

‘पार्टी सोसाइटी’ यानी वामपंथी कार्यकर्ताओं का यह समूह, सरकार एवं जनता के बीच मुख्य कड़ी बन गया| आम जनता के जीवन में पार्टी सोसाइटी का सीधा हस्तक्षेप आ गया| इनकी अनुमति के बिना कोई सरकारी सुविधा का लाभ नहीं ले सकता था| प्रशासन, पुलिस थाना सब कुछ इनके इशारे पर चलते थे| यहाँ तक की पति - पत्नी के बीच के झगडे भी पार्टी सोसाइटी ही सुलझाने लगी|

चुनाव में पार्टी सोसाइटी ही निर्णय करती थी कि किस को मतदान करना है| पंचायत चुनाव में कौन खड़ा होगा यह पार्टी सोसाइटी तय करती थी| पार्टी सोसाइटी द्वारा तय उम्मीदवार के खिलाफ कोई चुनाव में खड़ा नहीं हो सकता| अगर किसी ने इसकी नाफ़रमानी की तो खैर नहीं| ये अपने निर्णय को बड़े निर्ममता एवं जरुरत पड़े तो बंदूक के बल पर लागू करते थे| विरोध का मतलब था गांव छोड़कर भागना या फिर मौत को गले लगाना| इसीलिए पंचायत चुनावों में बड़ी संख्या में वामपंथी उम्मीदवार निर्विरोध चुनाव जीतते रहे|

सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी यही हथकंडा अपनाया| वामपंथी पार्टी सोसाइटी की जगह तृणमूल के स्थानीय नेताओं ने ले ली| वामपंथी नेताओं व कार्यकर्ताओं के खिलाफ जमकर हिंसा हुआ| कभी जिनके डर दुसरे भागते थे अब खुद भागने पर मजबूर हुए|

2011 में सत्ता परिवर्तन के साथ पश्चिम बंगाल में परिवर्तन तो हुआ लेकिन बस यह कि वामपंथ की पार्टी सोसाइटी की जगह तृणमूल ने ले लिया| लेकिन एक अंतर था वामपंथ का अपना एक संगठन था| वह पार्टी सोसायटी या पंचायत कमेटी उस अनुशासित पार्टी संगठन का ही एक हिस्सा था| लेकिन ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के पास उस तरह का कैडर नहीं था| ऐसे में सत्ता पर नियंत्रण वह कम जो कभी वामपंथी शासन में पार्टी सोसाइटी करती थी, ममता बनर्जी की शासन में वह कम स्थानीय दबंग तृणमूल नेताओं के पास आ गया|

वामपंथ के दौर में जो पार्टी सोसाइटी की हिंसा अनुशासित पार्टी संगठन का हिस्सा था, तृणमूल के दौर में उसका स्थान स्थानीय नेताओं की गुंडागर्दी ने ले लिया| वामपंथ के दौर में पार्टी सोसाइटी पर सीपीएम के वरिष्ठ नेताओं का एक नियंत्रण था, लेकिन ममता बनर्जी की शासन में उनके स्थानीय दबंग नेता बे लगाम हो गए|

इसी हिंसा के चलते पश्चिम बंगाल में आम जनता कभी भी अपनी राजनीति राय खुलकर नहीं रखती है| क्योंकि चुनाव के बाद की हिंसा का पश्चिम बंगाल में इतिहास रहा है|

राज्य प्रशासन का राजनीतिकरण भी पश्चिम बंगाल की राजनीतिक हिंसा का एक कारण है| पश्चिम बंगाल में सामाजिक एवं राजनीतिक शांति के लिए प्रशासन का राजनीतिकरण खत्म कर उसे निष्पक्ष बनाना तथा सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों को जिंदा करना बहुत जरूरी है|

 


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