देश में हरित क्रांति लाने में रासायनिक उर्वरकों का प्रमुख योगदान रहा है। प्रारंभ तो इन उर्वरकों का उपयोग संतुलित मात्रा में किया जाता था, लेकिन बाद में अधिक अन्न उपजाने के लालच में इसका अंधाधुंध उपयोग होने लगा। इससे न सिर्फ रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में बेतहाशा वृद्धि हुई बल्कि किसान प्राकृतिक खादों को पूरी तरह भूल गए। नतीजा यह हुआ कि भूमि की उर्वरा शक्ति का ह्रास होने लगा और उत्पादन क्षमता घटने लगी।
अब एक बार फिर से खेती में पुन: टिकाऊपन लाने और इसे लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खादों को प्राथमिकता देना अनिवार्य हो गया है। जैविक खादों में केंचुआ खाद यानि वर्मी कंपोस्ट एक महत्वपूर्ण आदान है, जिसकी सार्थकता को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी ने स्वीकारा है।
वर्मी कंपोस्ट का उपयोग बड़े पैमाने पर
अब अनेक विकसित व विकासशील देशों में वर्मी कंपोस्ट का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाने लगा है। बीते कुछ समय से लोगों में भी ऑर्गेनिक यानि बिना उर्वरकों के इस्तेमाल के उगाई गए फलों व सब्जियों की मांग बढ़ी है। लोग जैविक खेती से तैयार की गई सब्जियों का सेवन करने में फिर से रुचि दिखाने लगे हैं। ऐसे में यह और भी जरूरी हो गया है कि कृषि जगत में किसान फिर से जैविक खेती की ओर रुख करें। खेती की लागत कम करने और अच्छी फसल की पैदावार के लिए जैविक खाद तैयार की जा सकती है। सबसे खास बात यह कि अब यह खाद जलकुंभी से भी तैयार की जा सकती है। इस दिशा में बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है।
वैज्ञानिकों ने जलकुंभी से बनाया वर्मी कंपोस्ट
बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने जलकुंभी से वर्मी कंपोस्ट तैयार कर लिया है। इस तरह के वर्मी कंपोस्ट के उपयोग से न सिर्फ खेतों की मिट्टी मजबूत होगी बल्कि किसानों का उत्पादन लागत भी घटेगी और वे आर्थिक रूप से समृद्ध होंगे।
अन्य कंपोस्ट की तुलना में ज्यादा गुणवत्तापूर्ण
वर्मी कंपोस्ट में जलकुंभी का उपयोग किए जाने से जल की स्वच्छता को भी बल मिलेगा। जलकुंभी से तैयार वर्मी कंपोस्ट अन्य कंपोस्ट की तुलना में ज्यादा गुणवत्तापूर्ण है। शोध परियोजना के पीआई और बिहार कृषि विश्वविद्यालय में विज्ञान के सहायक प्राध्यापक डॉ. एमसी पॉल ने बताया कि जलकुंभी एवं अन्य खरपतवार लोगों के लिए परेशानी का सबब बनते जा रहे हैं।
ऐसे खरपतवारों का भी सही उपयोग कर इससे वर्मी कंपोस्ट बनाया जा सकता है। इसका बेहतर उपयोग कृषि कार्य में किया जा सकता है। इस कार्य से हम युवाओं के लिए रोजगार भी बढ़ा सकते हैं। इसी दिशा में इस परियोजना को मुकाम पर पहुंचाया गया है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने गोराडीह प्रखंड के कासिमपुर गांव को गोद लिया है। वहां के किसानों को जल्द जलकुंभी से वर्मी कंपोस्ट बनाने का प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में उगी जलकुंभी का किसान बेहतर उपयोग कर सकें।
किसानों की आर्थिक समृद्धि की दिशा में प्रतिबद्ध
बीएयू के कुलपति डॉ. अरुण कुमार ने बताया कि विश्वविद्यालय किसानों की आर्थिक समृद्धि की दिशा में प्रतिबद्ध है। यहां के वैज्ञानिक नित्य नये शोध में लगे हुए हैं। जलकुंभी अब परेशानी का सबब नहीं, बल्कि किसानों के लिए वरदान बनेगी। बीएयू सबौर में शोध निदेशक डॉ. फिजा अहमद ने बताया कि पूर्वी बिहार में कोसी और सीमांचल जिले बाढ़ प्रभावित हैं। यहां जलकुंभी जैसे खरपतवार अत्यधिक पाये जाते हैं। अब इससे वर्मी कंपोस्ट तैयार कर किसानों को मदद पहुंचाई जायेगी। यहां के वैज्ञानिकों ने शोध में यह सफलता पाई है।