सुशासन, यानि ऐसा शासन जिसमें किसी का शोषण न हो और कोई न्याय से वंचित न रहे। पीएम मोदी (PM Modi) को शासन करते हुए 20 साल से अधिक हो गए हैं। 13 साल गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और साल 2014 से यानि की पिछले 7 सालों से वह देश के प्रधानमंत्री हैं। अपने इस 20 साल के दौरान पीएम मोदी ने सबसे अधिक जोर सुशासन पर ही दिया है। समाज के सबसे वंचित तबके के लिए पीएम मोदी ने काम करने का प्रयास किया है।
आर्थिक नीतियों से छोड़ी अपनी छाप
मुख्यमंत्री के तौर पर या फिर प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीतियां हमेशा ही अर्थशास्त्रियों को चौकाने वाली रही हैं। जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब राज्य की आर्थिक पहचान ‘गुजरात मॉडल’ के रूप में सारे देश में पहचानी गई। और जब उन्होंने केंद्र में प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता संभाली तब एक से बढ़कर एक आर्थिक फैसलों से देश की अर्थव्यवस्थाओं को नई दिशा दी। वडनगर से वैश्विक मंचों तक अपनी छाप छोड़ने वाले पीएम मोदी का अर्थशास्त्र हमेशा ही कुछ हटकर रहा है।
‘गुजरात मॉडल’ की प्रसिद्धि
गुजरात के पत्रकार जपन पाठक, गुजरात मॉडल पर कहते है कि जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो गुजरात की विकास दर हमेशा डबल डिजिट में रही। यह बहुत बड़ी बात थी एक राज्य का इतने लंबे समय तक विकास की रफ्तार को कायम रखना। कृषि विकास दर भी उस समय लगातार 9% के आसपास रहा। जब नरेंद्र मोदी ने राज्य की बागडोर संभाली थी राज्य में राजनीतिक अस्थिरता थी, पानी की कमी से जूझ रहा था, वहीं कच्छ में आए भूकंप से राज्य की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई थी और फिर गोधरा दंगों के कारण राज्य की छवि बहुत अच्छी नही थी। जब नरेंद्र मोदी आए तो उन्होंने पाँच चीजों पर बहुत ध्यान दिया। जल शक्ति, ऊर्जा शक्ति, सुरक्षित बॉर्डर, जनशक्ति और कौशल पर विशेष ध्यान देना आदि ऐसे विषय थे जिनपर मुख्यमंत्री नरेंद्र ने सबसे अधिक ध्यान दिया।
गुजरात मॉडल था समावेशी विकास का मॉडल
गुजरात मॉडल की विशेषताओं पर वरिष्ठ पत्रकार चरणजीत सिंह कहते हैं कि राज्य के विकास में सिर्फ किसी एक क्षेत्र पर ही जोर नहीं दिया गया बल्कि सभी क्षेत्रों चाहे कृषि हो, उद्योग हों या सेवा क्षेत्र हो हर किसी पर बराबर नजर रखी गई। दूसरे शब्दों में कहे तो गुजरात मॉडल एक समावेश विकास का मॉडल था।
बतौर पीएम देश का अर्थिक परिदृश्य बदला
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा
सरकार के कदमों से देश में एफडीआई का प्रवाह निरंतर बढ़ा है। अप्रैल 2020 से जनवरी 2021 के बीच भारत में 72.12 अरब डॉलर का एफडीआई आया। यह वित्त वर्ष 2019-20 की तुलना (62.72 अरब डॉलर) में 15 फीसदी ज्यादा एफडीआई था। यह किसी भी वित्तीय वर्ष के पहले 10 महीने में आया सबसे अधिक एफडीआई रहा। रुझानों के अनुसार वित्त वर्ष 2020-21 (54.18 अरब डॉलर) के पहले 10 महीने में एफडीआई इक्विटी प्रवाह 28% बढ़ गया है। वित्त वर्ष 2020-21 के पहले 10 महीने में एफडीआई इक्विटी के जरिए निवेश करने वाले देशों में 30.28 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ सिंगापुर सबसे अव्वल रहा। इसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका (24.28) और यूएई (7.31%) का स्थान है। वही जनवरी 2021 के दौरान कुल एफडीआई इक्विटी प्रवाह में 29.09 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ जापान सबसे आगे रहा। इसके बाद सिंगापुर (25.46%) और यू.एस.ए. (12.06%) का स्थान रहा। वित्त वर्ष 2020-21 के पहले 10 महीने में 45.81 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर क्षेत्र से सबसे ज्यादा एफडीआई इक्विटी प्रवाह हुआ है। इसके बाद निर्माण (इंफ्रास्ट्रक्चर) गतिविधियों (13.37%) और सेवा क्षेत्र (7.80%) में एफडीआई आया। रूझान के अनुसार अकेले जनवरी 2021 में 21.80 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ कंसल्टेंसी सेवाएं कंप्यूटर सॉफ्टवेयर में सबसे ज्यादा एफडीआई आया। इसके बाद कंप्यूटर और हार्डवेयर (15.96%) और सेवा क्षेत्र (13.64%) की हिस्सेदारी रही। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में निम्नलिखित रुझानों से साफ है कि भारत, वैश्विक निवेशकों के लिए निवेश का एक प्रमुख स्थान बन गया है।
स्टार्टअप के क्षेत्र में किया कमाल
हमारे स्टार्टअप इकोसिस्टम में भारत को दुनिया का इनोवेशन एंड इन्वेंशन हब बनाने की क्षमता है। इस दिशा में नेशनल स्टार्टअप एडवाइजरी काउंसिल एसी भारत में नए स्टार्टअप उद्यमियों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता तैयार करने के लिए अथक प्रयास कर रही है। इसी के साथ भारत को स्टार्टअप की राजधानी बना जाएगा। जी हां, केंद्र सरकार का उद्देश्य ‘स्टार्टअप इंडिया’ को राष्ट्रीय भागीदारी और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बनाना है। इसी के साथ 21 यूनिकॉर्न पिछले 6 महीनों से सभी को बड़े सपने देखने और बड़ा हासिल करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। लगभग 60 यूनिकॉर्न के साथ, भारत के पास पूरी दुनिया में सबसे बड़ा स्टार्टअप है। स्कूल अब कम उम्र में स्टार्टअप विचारों के बीज बोएंगे। आज के युवा कल के रोजगार सृजनकर्ता और इनोवेशन के लिए चौथी औद्योगिक क्रांति के नेता साबित होंगे। पूरे भारत में विशेष रूप से टियर-2 और टियर-3 शहरों में नए स्टार्टअप उभरें। स्टार्टअप, रोजगार सृजन को बढ़ावा देगा और अगड़ों एवं पिछड़ों के संबंधों को मजबूत करेगा।
प्रधानमंत्री के तौर पर कुछ बड़े निर्णय
7 साल के दौरान केंद्र सरकार का सबसे साहसिक आर्थिक कदम रहा 10 सरकारी बैंकों का बड़े बैंकों में विलय। दरअसल, इससे वर्कफोर्स का सही इस्तेमाल हो पाया और खर्चों में भी कटौती हुई। इन बदलावों के बाद मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिरता आई और भारतीय कंपनियां मजबूत होकर विस्तार के लिए तैयार हो गई। फिलहाल, भारतीय अर्थव्यवस्था विकास की राह पर लौट आई है। आपको यह जानकर बेहद हैरानी होगी कि 1991 से 2021 के बीच देश के जीडीपी में कुल 10 गुना बढ़ोतरी हुई है और महंगाई दर 6 फीसदी के आसपास स्थिर हो गई है। वहीं देश के विदेशी मुद्रा भंडार में 76 गुना की बढ़ोतरी हुई है। साल 2000 से 2020 के बीच शेयर बाजार में लिस्टेड भारतीय कंपनियों के मार्केट कैप में कुल 11.5 गुना की बढ़ोतरी हुई। इस दौरान हमारे बंदरगाहों पर कंटेनरों का ट्रैफिक भी बढ़ा है। भारत की प्रति व्यक्ति आय में पहले से अधिक बढ़ोतरी हुई है। यानि लगभग सारे मानकों पर देश ने तरक्की की।