भारतीय चीनी की चाशनी में डूबी दुनिया

पूरी दुनिया में भारत की चीनी की मिठास घुल रही है। इसके संकेत चीनी के निर्यात में हुई वृद्धि से मिलते हैं। दरअसल, भारत की चीनी का निर्यात वर्तमान समय में 10 गुना अधिक बढ़ चुका है। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2013-14 के अप्रैल-जुलाई माह में भारत का चीनी का निर्यात 1,788 करोड़ रुपए का था जो वर्ष 2022-23 के अप्रैल-जुलाई की अवधि में 17,987 करोड़ रुपए हो चुका है।

भारत दुनिया में चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक

भारत दुनिया में चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक है। चीनी निर्यात में केवल वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान ही 64.90 % की वृद्धि हुई। गौर करें तो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में चीनी के निर्यात में करीब 65% का उछाल दर्ज किया गया। यह वृद्धि उच्च माल भाड़ा बढोतरी, कंटेनरों की कमी इत्यादि के रूप में कोविड-19 महामारी द्वारा उत्पन्न लॉजिस्ट्क्सि संबंधी चुनौतियों के बावजूद अर्जित की गई।

दुनियाभर में पहुंची भारत की चीनी की मिठास

वहीं भारतीय चीनी ने पूरी दुनिया के लोगों की जिंदगी में ऐसी मिठास घोली है कि इसके बिना अब इंसान का जीवन फीका हो जाता है। भारतीय चीनी बिना किसी विटामिन-मिनरल के ही, सिर्फ अपनी मिठास के दम पर लोगों की फेवरेट बनी हुई है। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ कमर्शियल इंटेलिजेंस एंड स्टैटिस्टिक्स (डीजीसीआईएंडएस) के डाटा के अनुसार, भारत ने विश्व भर के 121 देशों को चीनी का निर्यात किया।

आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2021-22 (अप्रैल-फरवरी) में, भारत ने इंडोनेशिया को 769 मिलियन डॉलर के बराबर का चीनी निर्यात किया था जिसके बाद बांग्लादेश (561 मिलियन डॉलर), सूडान (530 मिलियन डॉलर) तथा संयुक्त अरब अमीरात (270 मिलियन डॉलर) का स्थान रहा। भारत ने सोमालिया, सऊदी अरब, मलेशिया, श्रीलंका, अफगानिस्तान, इराक, पाकिस्तान, नेपाल, चीन आदि देशों में भी चीनी का निर्यात किया। भारतीय चीनी का आयात अमेरिका, सिंगापुर, ओमान, कतर, तुर्की, ईरान, सीरिया, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, फ्रांस, न्यूजीलैंड, डेनमार्क, इजरायल, रूस, मिस्र आदि देशों में किया गया है।

चीनी उद्योग भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कृषि आधारित उद्योग

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक की देश में कुल चीनी उत्पादन में लगभग 80% की हिस्सेदारी है। देश के अन्य प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में आंध्र प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, बिहार, हरियाणा तथा पंजाब शामिल हैं। आज के समय में चीनी उद्योग जिस तरीके से फल-फूल रहा है ऐसे में यह देश का एक महत्वपूर्ण कृषि आधारित उद्योग बन गया है जो करीब 5 करोड़ गन्ना उत्पादक किसानों और उनके आश्रितों के साथ-साथ चीनी मिलों और संबंधित सहायक गतिविधियों में कार्यरत 5 लाख श्रमिकों की ग्रामीण आजीविका को प्रभावित करता है।

कितना हुआ चीनी निर्यात

साल 2021-22 में करीब 100 LMT चीनी का निर्यात हुआ और 35 एलएमटी चीनी का इस्तेमाल इथेनॉल के लिए किया गया। वर्ष 2025 तक, 50-60 एलएमटी अतिरिक्त चीनी का इथेनॉल के उत्पादन में उपयोग करने का लक्ष्य रखा गया है, जो चीनी के उच्च भंडार, मिलों के पास नगदी की कमी जैसी समस्याओं को दूर करेगा, जिससे किसानों को गन्ने का बकाया भुगतान समय पर चुकाने में मदद मिलेगी। बीते तीन चीनी सत्रों में चीनी मिलों/डिस्टलरीज ने तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) को इथेनॉल बेच करके 22,000 करोड़ रुपए राजस्व हासिल किया था।

गन्ना किसान और चीनी उद्योग ऊर्जा क्षेत्र में भी दे रहे योगदान

भारतीय गन्ना किसान और चीनी उद्योग ऊर्जा क्षेत्र में भी योगदान दे रहे हैं। दरअसल, कृषि अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के दृष्टिकोण के साथ आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने और कच्चे तेल के आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा बचाने और वायु प्रदूषण घटाने के लिए, सरकार ने पेट्रोल के साथ ईंधन की गुणवत्ता इथेनॉल को 2022 तक 10% और 2025 तक 20% सम्मिश्रण (ब्लेंडिंग) लक्ष्य तय किया है।

भारत में तीनों ही श्रेणियों होता है चीनी का उत्पादन

भारत तीनों ही श्रेणियों– कच्ची, रिफाइंड और श्वेत- की चीनी का उत्पादन करता है। भारतीय चीनी उच्च गुणवत्ता वाली होती है और यह डैक्सट्रेन से मुक्त होती है क्योंकि गन्ना काटने के बाद निम्नतम समय में मिल में गन्ने की पेराई होती है।

अगस्त 2022 में  केंद्र 112 लाख मीट्रिक टन तक निर्यात के बाद भी उचित मूल्य पर देश में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता रहेगी।  भारत अब चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक और दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश है

किसानों की बढ़ेगी आय

जिस तेजी के साथ भारत ने चीनी का रिकॉर्ड निर्यात किया है उससे चीनी उत्पादकों को उनके भंडार में कमी लाने में मदद मिलेगी, साथ ही यह कदम गन्ना किसानों को भी लाभान्वित करेगा क्योंकि भारतीय चीनी की बढ़ी हुई मांग से उनकी प्राप्ति में सुधार आने की उम्मीद है। कृषि निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि को देश के कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने की सरकार की प्रतिबद्धता के प्रमाण के रूप में भी देखा जा रहा है।

चीनी उद्योग बना आत्मनिर्भर 

कुछ समय पहले तक, चीनी मिलों की आय मुख्य रूप से चीनी की बिक्री पर निर्भर थीं। किसी भी सीजन में अतिरिक्त उत्पादन उनकी भुगतान क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, जिससे गन्ना उत्पादक किसानों की धनराशि बकाया हो जाती है। उनकी भुगतान क्षमता में सुधार के लिए समय-समय पर सरकारी हस्तक्षेप किए गए। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में अतिरिक्त चीनी के निर्यात को प्रोत्साहित करने और चीनी को इथेनॉल में बदलने सहित केंद्र सरकार की सक्रिय नीतियों के कारण, चीनी उद्योग अब आत्मनिर्भर हो गया है। ऐसा में यह कहना बिलकुल उचित होगा कि केंद्र सरकार द्वारा किए गए उपायों और एफआरपी में वृद्धि से किसानों को गन्ने की खेती के लिए प्रोत्साहित किया गया है और चीनी के घरेलू उत्पादन के लिए चीनी मिलों के निरंतर संचालन की सुविधा मिली है। चीनी उद्योग के लिए सरकार द्वारा बनाई गई सकारात्मक नीतियों के परिणामस्वरूप भारत भी अब ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनता जा रहा है।

 


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