भारतीय रेल आज इतिहास बनाने जा रहा है। आज सिकंदराबाद में दो ट्रेन आमने सामने एक ही पटरी पर एक दूसरे की तरफ पूरी रफ्तार से दौड़ लगाएंगी तथा एक दूसरे से टकराने की कोशिश करेंगी। इनमे से एक ट्रेन की इंजन में खुद रेलमंत्री अश्वनी वैष्णव बैठे होंगे तो दूसरी ट्रेन की इंजन में रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष।
यह दरअसल भारतीय रेल की स्वदेशी सुरक्षा प्रणाली ‘कवच’ Kavach का परीक्षण है। स्वदेशी रूप से विकसित यह सुरक्षा प्रणाली ट्रेनों को आपस में टकराने से रोकती है।
भारतीय रेल आज इस तकनीक का प्रदर्शन रेलमंत्री अश्वनी वैष्णव की उपस्थिति में सिकंदराबाद में करने जा रहा है। भारतीय रेल इस कवच सुरक्षा प्रणाली के माध्यम से रेल परिचालन को दुर्घटना रहित तथा पूर्ण रूप से सुरक्षित बनाने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है।
भारतीय रेल कवच तकनीक पर वर्ष 2016 से ही काम कर रहा है। पहले इसे 110 किलोमीटर प्रति घंटा पर विकसित किया गया। लगातार परीक्षण एवं विकास के दौर से गुजरते हुए अब यह कवच तकनीक 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ती ट्रेनों पर भी कार्य करता है।
अगर ट्रेन का ड्राइवर आपात स्थिति में ब्रेक लगाना भूल जाता है तो निश्चित दूरी तक ट्रेनों के आमने सामने आने पर इस तकनीक के कारण ट्रेनों में अपने आप ब्रेक लग जाएगा।
कवच सुरक्षा प्रणाली तीन स्थितियों में कार्य करता है, ट्रेनों के आमने सामने एक निश्चित दूरी तक आ जाने पर, एक ट्रेन के दूसरे ट्रेन के पीछे आ जाने पर या फिर लाल सिग्नल क्रॉस कर जाने पर।
अगर कोई ट्रेन मानवीय भूल से लाल बत्ती क्रॉस कर जाता है तो इस कवच तकनीक के कारण उस ट्रेन में अपने आप ब्रेक लग जाएगा।
ट्रेनों को आपस में टकराने से रोकने की यह स्वदेशी तकनीक विश्व में सबसे सस्ती है। कवच के परिचालन का खर्च 50 लाख रुपया प्रति किलोमीटर है, जबकि विश्व की दूसरी तकनीकों दो करोड़ रूपया प्रति किलोमीटर है।
वर्तमान में इसका दक्षिण रेलवे में परिक्षण चल रहा है। इस वर्ष के आम बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2000 किलोमीटर के रेल रूट को कवच तकनीक से युक्त करने का लक्ष्य रखा था। रेलवे की योजना प्राथमिकता के आधार पर दिल्ली - मुंबई एवं दिल्ली - हावड़ा रूट के 3000 किलोमीटर रेल रूट को इस तकनीक से युक्त करने की है।
रेल रूट को कवच प्रणाली से युक्त हो जाने के बाद ट्रेनों की रफ्तार बढ़ाने में भी सहायता मिलेगी।