भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने 6 अगस्त को एक सुनवाई में सरकार से पूछा कि क्या वह उन न्यायाधिकरणों (ट्रिब्यूनल्स) को बंद करने का इरादा रखती है, जिनमें कई महत्वपूर्ण पद खाली हैं। यह टिप्पणी लोकसभा द्वारा विधेयक पारित करने के कुछ दिनों बाद आई है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने 2 अगस्त, 2021 को लोकसभा में ट्रिब्यूनल्स सुधार विधेयक, 2021 Tribunal Reform Bill 2021 को पेश किया। बिल ट्रिब्यूनल्स को भंग करने और उनके कार्यों (जैसे अपीलों पर न्यायिक निर्णय लेना) को दूसरे मौजूदा न्यायिक निकायों को ट्रांसफर करने की हिमायत करता है। 3 अगस्त को बिल लोकसभा से पारित होने के बाद 9 अगस्त को राज्यसभा से भी पारित हो गया। बिल इसी साल अप्रैल में जारी एक अध्यादेश की जगह लेगा।
बिल किस बारे में है?
यह ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल, 2021 अप्रैल 2021 में लाये एक अध्यादेश की जगह लेता है, जिसमें विभिन्न कानूनों के तहत विवादों को सुनने के लिए अपीलीय निकायों के रूप में कार्य करने वाले आठ ट्रिब्यूनल को बंद करने का सुझाव था। इसके बाद बचे हुए अपने कार्यों को मौजूदा न्यायिक मंचों जैसे कि सिविल कोर्ट या उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया था।
विधेयक में कहा गया है कि बंद किए जाने वाले ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और सदस्य अपने पद से हट जाएंगे, और वे तीन महीने के वेतन के बराबर मुआवजे और उनकी समय से पहले समाप्ति के लिए भत्ते का दावा कर सकेंगे।
फाइनैन्स एक्ट 2017 में संशोधन
2017 का फाइनैन्स एक्ट क्षेत्रों के आधार पर ट्रिब्यूनल्स का विलय करता है। यह केंद्र सरकार को अधिकार देता है कि वह निम्नलिखित के संबंध में नियमों को अधिसूचित करे (i) सर्च-कम-सिलेक्शन कमिटीज का संयोजन, (ii) ट्रिब्यूनल के सदस्यों की क्वालिफिकेशन, और (iii) उनकी सेवा की अवधि और शर्तें (जैसे उन्हें हटाना और वेतन आदि)। बिल फाइनैन्स एक्ट से इन प्रावधानों को हटाता है। सिलेक्शन कमिटीज के संयोजन और कार्यकाल संबंधी प्रावधान बिल में शामिल किए गए हैं। केंद्र सरकार सदस्यों की क्वालिफिकेशन और सेवा के अन्य नियमों और शर्तों को तय समय पर अधिसूचित करेगी।
कौन से ट्रिब्यूनल बंद किए जा रहे हैं?
सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के तहत फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण (FCAT) कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के तहत बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड; और सीमा शुल्क उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण प्रमुख हैं। सरकार ने कहा है कि पिछले तीन वर्षों के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि कई क्षेत्रों में न्यायाधिकरणों ने तेजी से न्याय प्रदान नहीं किया है और वे काफी खर्च कर रहे हैं। इसके चलते ट्रिब्यूनल के कामकाज को युक्तिसंगत बनाने का निर्णय लिया है।
भारत में फिलहाल 16 ट्रिब्यूनल हैं, जिनमें नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, आर्म्ड फोर्सेज अपीलेट ट्रिब्यूनल, डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल सहित अन्य शामिल हैं। इन्हीं ट्रिब्यूनलों में खाली पदों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अभी हालिया टिप्पणी की है।
ट्रिब्यूनल भंग होने पर लंबित मामलों का क्या होगा
इन मामलों को तुरंत उच्च न्यायालयों या वाणिज्यिक सिविल अदालतों में स्थानांतरित कर दिया जाएगा। सरकार के इस कदम की प्रभावशीलता पर कानूनी विशेषज्ञों की अलग अलग राय है। जहां एक ओर, मामलों को उच्च न्यायालयों में ले जाने पर तेजी से सुनवाई और निपटान हो सकता है, विशेषज्ञों को डर है कि नियमित अदालतों में विशेषज्ञता की कमी के चलते निर्णय लेने की प्रक्रिया के लिए हानिकारक हो सकती है। उदाहरण के लिए, एफसीएटी के फैसलों को सुनना, जिसमें कला और सिनेमा में विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।