ममता ने क्यों किया मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या में एक तिहाई की कमी

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है| लेकिन इस बार ममता बनर्जी ने अपने पार्टी के मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या में भारी कमी की है|

2016 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने 53 मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा था| लेकिन इस बार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी ने सिर्फ 35 मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा है| यानि पिछली बार की तुलना में इस बार तृणमूल कांग्रेस ने मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या में लगभग 34 प्रतिशत की कमी की है|

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 27 प्रतिशत है| 2016 में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के कुल उम्मीदवारों का 18 प्रतिशत उम्मीदवार मुस्लिम थे| इस बार तृणमूल कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रतिशत 18 से घटकर 12 प्रतिशत रह गया है|

अब प्रश्न यह है कि जिस ममता बनर्जी ने के मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ करने के लिए इतना ज्यादा राजनीतिक निवेश किया, उन्होंने अचानक मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या में कमी क्यों कि?

आईये इस रणनीति को समझने की कोशिश करते हैं| सबको मालूम है कि पश्चिम बंगाल की मुस्लिम वोट पर अपनी एकमुश्त पकड़ बनाने के लिए ममता बनर्जी ने सारी सीमाएं पार कर दी| मुसलमानों का सबसे बड़ा हितेषी साबित करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ा| चाहे कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं को लुभाना हो, कट्टरपंथी मुस्लिम समूहों की हिंसक गतिविधियों पर आंखें बंद कर लेना हो, मौलवियों के लिए मासिक वेतन हो, कट्टरपंथी मौलाना को महत्वपूर्ण पद देना हो, दुर्गा पूजा एवं दुर्गा विसर्जन के कार्यक्रम में व्यवधान डालना हो और यहां तक की जय श्रीराम के नारे पर चिड जाना और लोगों को पकड़कर जेल में डाल देना हो, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुलकर मुस्लिम तुष्टीकरण का कार्ड खेला| इससे पश्चिम बंगाल के आम मुसलमानों को फायदा हुआ या नहीं हुआ यह अलग चर्चा एवं अध्ययन का विषय है| हाँ इससे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी को जबरदस्त फायदा हुआ| उनका मुस्लिम वोट पर एकक्षत्र कब्जा हो गया|

लेकिन ममता बनर्जी की यह रणनीति दो धारी तलवार साबित हुई| मुस्लिम वोट पर नियंत्रण के लिए जिस तरह हिंदू भावनाओं को अनदेखा किया गया, उसका उल्टा असर पड़ा| हिन्दू समाज का एक बड़ा वर्ग अपने आप को महत्वहीन, दरकिनार किया हुआ तथा अपमानित महसूस करने लगा|

पश्चिम बंगाल में सेकुलरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हुए खुल्लम-खुल्ला मुस्लिम तुष्टिकरण एवं हिंदुओं को हाशिए पर धकेलने के प्रयासों के कारण, हिंदू समाज के अंदर पैदा हुए गुस्से को भारतीय जनता पार्टी हवा देने में सफल रही| जिसका असर 2019 के लोकसभा चुनाव में दिख चूका है|

शुरू में ममता बनर्जी भाजपा को खारिज करती रही| लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव परिणामों ने उनकी आखें खोल दी| भाजपा के पक्ष में हिंदू वोटों का जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ और वह लोकसभा की 18 सीटें जीतने में सफल रही|

भाजपा की अप्रत्याशित सफलता से घबराई ममता बनर्जी ने चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपने साथ जोड़ा| प्रशांत किशोर के ही कहने पर ममता ने अपनी हिंदू विरोधी छवि को बदलने की कोशिश शुरू कर दी|

मुसलमान उम्मीदवार कम किए जाने के पीछे की रणनीति यह है कि चुकी मुसलमान पूरी तरह से ममता के साथ है और वैसे भी उनके पास तृणमूल के अलावा कोई विकल्प नहीं है, तो ऐसी परिस्थिति में ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार उतारना भाजपा की रणनीति को आसान करता है| पार्टी का मानना है मुस्लिम उम्मीदवार की स्थिति में भाजपा के लिए हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करना आसान हो जायेगा|

इसलिए रणनीति के तहत ममता बनर्जी ने इस बार मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या कम कर दिया है| भाजपा के आक्रामक प्रचार में ममता को उनकी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है| उनको समझ आ गया है की सिर्फ मुस्लिम वोटो के सहारे चुनाव नहीं जीता जा सकता है|

 


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