प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने क्यों लिया तीनों कृषि कानूनों को वापस?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को श्री गुरु नानक जयंती के अवसर पर सुबह सुबह राष्ट्र को संबोधित करते हुए तीनों नये कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की तथा आंदोलनरत किसानों से घर लौटने की अपील की। उन्होंने कहा कि 29 नवम्बर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा किया जाएगा।

प्रधानमंत्री मोदी के इस निर्णय से बड़ी संख्या में उनके समर्थकों एवं प्रसंशको को धक्का लगा है तथा उनमे एक निरासा की भावना है। जो की स्वाभाविक है। यह बात प्रधानमंत्री मोदी को भी मालूम है की उनके इस निर्णय से सबसे ज्यादा नुकसान उनकी छवि को होगा। उनके समर्थक जो अबतक सीना चौड़ा करके कहते थे की ‘मोदी है तो मुमकिन है’, वह अब इसपर संदेह प्रकट कर सकते है। मोदी की एक सशक्त छवि को नुकसान पंहुचा है। यह सब जानते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने यह निर्णय क्यों लिया? अपनी छवि को दाव पर क्यों लगाया?

अपने सात साल के कार्यकाल में यह दूसरा मौका है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने किसी फैसले पर पीछे हटे हो। इससे पहले अपने पहले कार्यकाल में जमीन अधिग्रहण कानून पर सरकार को पीछे हटना पड़ा था।

तो क्या कृषि कानून पर सरकार उत्तर प्रदेश एवं पंजाब विधानसभा चुनाव के वजह से पीछे हटी? वैसे एक राजनेता एवं राजनीतिक दल के हर निर्णय के पीछे राजनीति होती है, लेकिन यह कहना की सिर्फ विधानसभा चुनावो को ध्यान में रख कर सरकार ने कृषि कानूनों को वापस लेने का निर्णय लिया है, यह प्रधानमंत्री मोदी के साथ थोडा अन्याय होगा। इन कानूनों के बनने के बाद और जब किसान आंदोलन अपने चरम पर था तब भाजपा ने बिहार विधानसभा का चुनाव जीता, असम विधानसभा का चुनाव जीता, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन कर 5 से 75 पर पहुच गयी। तो चुनाव के वजह से वापस हुआ यह आरोप पूर्णरूप से सत्य नहीं है क्योंकि वैसे भी पंजाब में भाजपा का कुछ है नहीं और उत्तर प्रदेश में पश्चिम उत्तर प्रदेश से आगे इसका कोई खास प्रभाव नहीं है।

यह सर्व विदित है की प्रधानमंत्री मोदी राजनीति की आदर्शवादी दुनिया में नहीं बल्कि वास्तविकता की धरातल पर राजनीति करते है। कृषि कानूनों पर लिया गया निर्णय भी एक सहज एवं प्रैक्टिकल राजनीतिक निर्णय है जिसके पीछे मूलरूप से दो कारण है। पहला लॉगजैम यानी गतिरोध तोडना और दूसरा राष्ट्रीय सुरक्षा।

पिछले एक साल से तीनों कृषि कानूनों को लेकर गतिरोध बना हुआ है। कुछ किसान एवं विपक्ष आंदोलनरत है, लगातार कानून व्यवस्था के गंभीर संकट पैदा होते जा रहे है और बीच का रास्ता निकलता दिखाई नही दे रहा था। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है। सुप्रीम कोर्ट भी तीनों कृषि कानूनों के लागु करने पर अनिश्चित काल के लिए रोक लगाकर पिछले एक साल से सोया पड़ा है। इन कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमीटी को भी अपना रिपोर्ट दिए लम्बा समय हो गया। उस पर कोई निर्णय लेना तो दूर सुप्रीम कोर्ट ने आज तक उस रिपोर्ट को सार्वजनिक तक नहीं किया। कोर्ट कब तक कोई निर्णय लेगा किसी को कुछ पता नहीं। यानी ऐसी परिस्थिति में तीनो कृषि कानूनों की स्थिति है एज गुड एज डेड अर्थात मृतप्राय।

यह तीनो कानून सरकार के लिए बोझ बन गये थे। सुप्रीम कोर्ट के रोक के कारण सरकार न तो इन कानूनों को लागु कर पा रही थी और नहीं आंदोलनकारियों को समझाकर आंदोलन ख़त्म कर रास्ते खुलवा पा रही थी।

दूसरी तरफ इन आन्दोलनों के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा बढता चला जा रहा था। देश विरोधी ताकते लगातार माहौल बिगाड़ने की कोशिश में लगे थे। पाकिस्तान की आई एस आई एवं खालिस्तानी इन आंदोलनों के नाम पर पंजाब के माहौल को बिगाड़ने में लगे थे। कही पंजाब में फिर से आतंकवाद वाली स्थिति पैदा न हो जाये इस बात के गंभीर खतरा पैदा हो गया था। और जब तक आंदोलन चल रहा है ऐसी ताकतों के खिलाफ कठोर कार्यवाई भी संभव नहीं है क्योंकि वैसी स्थिति में मामला और भड़क सकता था। देश में अस्थिरता पैदा करने में अब तो चीन की भी भूमिका खुल कर सामने आने लगी है। सिविल सोसाइटी के जरिये किस तरह विदेशी ताकते देश में अस्थिरता पैदा कर सकती है इसको लेकर कुछ दिन पहले खुद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल चेतावनी दे चुके है। उन्होंने उसे चौथी पीढ़ी का युद्ध बताया था।

अब ऐसी परिस्थिति में सरकार के पास विकल्प बहुत सिमित रह गए थे। गतिरोध तोडना बहुत जरुरी था। गतिरोध तोड़ने के लिए सरकार बल का प्रयोग नहीं कर सकती थी क्योंकि उस परिस्थिति में वही स्थिति पैदा हो जाती जो देश विरोधी ताकते चाहती थी। ऐसे में मृतप्राय कानून के लिए सरकार ने बल प्रयोग कर संकट को और बढ़ाने के बजाय कानून को ही निरस्त करने का निर्णय लिया।

अब यदि ये संगठन सरकार को बल प्रयोग करने पर मजबूर भी करते है तो जनता की सहानुभूति उनके साथ नहीं होगी। एक भावनाएं शांत होने के बाद सरकार सभी देश विरोधी ताकतों के खिलाफ खुलकर कार्यवाई कर सकेगी जैसा भिमाकोरेगावं मामले में हुआ।  

    


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