क्यों गंवानी पड़ी त्रिवेंद्र सिंह रावत को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी

भारतीय जनता पार्टी में इस सप्ताह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को बदल दिया| त्रिवेंद्र सिंह रावत (Trivendra Singh Rawat) की जगह तीरथ सिंह रावत उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री बन गए है| इसके साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी उत्तराखंड के उन मुख्यमंत्रियों की सूची में शामिल हो गए जो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए| नारायण दत्त तिवारी को छोड़कर आज तक कोई भी उत्तराखंड का मुख्यमंत्री (Chief Minister of Uttarakhand) अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है| त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी 4 साल ही मुख्यमंत्री रह पाए|

आईये समझने की कोशिश करते है की आखिर क्या कारण है कि पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ असंतोष पैदा हुआ और उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी| प्रथम दृष्टया इसके तीन मुख्य कारण है प्रतीत होते है, पहला प्रशासन यानी नौकरशाही पर पकड़ नहीं होना, दूसरा सबको साथ लेकर चलने में असफल एवं तीसरा कार्यकर्ता यानी कैडर में जोश पैदा करने में नाकाम रहना| ये तीन कारण चुनाव से ठीक एक साल पहले किसी के लिए भी शुभ नहीं हो सकते है|

त्रिवेंद्र सिंह रावत की सबसे बड़ी कमजोरी रही प्रशासन यानी नौकरशाही पर पकड़ नहीं होना| बेलगाम नौकरशाही मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की सबसे बड़ी नाकामी रही| एक तरह से इसी नाकामी ने कुछ हदतक बाकि समस्याओं को भी पैदा किया|

भाजपा के विधायक, सांसद एवं नेताओं की शिकायत रही की अधिकारी उनकी नहीं सुनते हैं| विधायको का कहना था की जिलों के डीएम / एसपी तक भी उनकी बात नहीं सुनते हैं| वह अपने क्षेत्र के लोगों एवं पार्टी का काम नही करवा पा रहे हैं| पार्टी के कार्यकर्ता एवं नेता दरकिनार एवं अपमानित महसूस कर रहे हैं| पूर्व मुख्यमंत्री पार्टी विधायकों एवं नेताओं की समस्याओं को दूर करने में असफल रहे| पार्टी नेताओं का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत में एरोगेंस यानी अहंकार आ गया था वह सबको साथ लेकर चलने में असफल रहे|

पूर्व मुख्यमंत्री कोई करिश्माई नेतृत्व भी नहीं दे पा रहे जो कार्यकर्ताओं में जोश पैदा करे| ऊपर से वामपंथी नौकरशाही के चक्कर में चारधाम सहित प्रदेश की 50 से ज्यादा मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लेने प्रयास एवं हरिद्वार महाकुंभ की कमजोर तैयारी तथा स्नान में बंदिशे जैसे कुछ ऐसे निर्णय लिए जो पार्टी कैडर के साथ – साथ धार्मिक नेताओ को भी नाराज कर गया|

इसी लिए नए मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने मुख्यमंत्री का कार्यभार सँभालने के कुछ घंटो के अन्दर ही पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार के फैसले को पलटते हुए घोषणा की की हरिद्वार महाकुम्भ में स्नान में किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं होगा| गुरुवार को महाशिवरात्रि के दिन होने वाले शाही स्नान की तैयारियों का जायजा लेने मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत खुद हरिद्वार पहुच गए| मुख्यमंत्री ने पुष्प वर्षा कर शाही स्नान में साधू संतों का स्वागत किया| यह पूरी कोशिश थी पिछली सरकार से पैदा नाराजगी को दूर करने की|

इन परिस्थितियों में मूलरूप से वामपंथी विचार रखने वाली नौकरशाही पर निर्भरता एवं उसका बेलगाम होना त्रिवेंद्र सिंह रावत के लिए घातक साबित हुआ|

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पिछले 6 साल में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्हें पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व ने बीच कार्यकाल में बदल दिया है| नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री एवं अमित शाह के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद से भाजपा ने राज्यों में गुटबाजी एवं बगावत को बढ़ावा देने से रोकने के उद्देश्य से छोटे-मोटे असंतोष के बाद भी बीच कार्यकाल में मुख्यमंत्री नहीं बदलने का निर्णय लिया था| लेकिन झारखंड के अनुभव को देखते हुए पार्टी ने उत्तराखंड में वही गलती नहीं दोहराने का निर्णय लिया|

झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास के खिलाफ पार्टी में काफी असंतोष होने के बाद भी पार्टी ने उनको नहीं बदलने एवं उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था| फलस्वरूप नाराज कार्यकर्ता पूरे जोश के साथ चुनाव अभियान में नहीं लगे और सरकार में अच्छी काम करने के बाद भी पार्टी चुनाव हार गई|

अब पार्टी वही गलती दोबारा उत्तराखंड में दोहराना नहीं चाहती थी| इसलिए नेताओं एवं कार्यकर्ताओं में असंतोष को रोकने के लिए पार्टी ने मुख्यमंत्री को बदलने का निर्णय लिया|

 


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