बिहार विधानसभा चुनाव में जनता का निर्णय EVM में कैद है और मंगलवार को नतीजे भी आ जायेंगे| लेकिन इस चुनाव के दौरान जो सबसे बड़ा रहस्य बनकर सामने आया वह है की आखिर बिहार को लेकर भारतीय जनता पार्टी की योजना क्या है? आखिर किस रणनीति के तहत वह बिहार विधानसभा चुनाव में उतरी थी और किस तरह के परिणाम की परिकल्पना पार्टी ने की है|
भाजपा के नेता चाहे जो भी कहे लेकिन राजनीती के जानकर हो या बिहार की जनता का एक बड़ा हिस्सा यह मानने को तैयार नही है की चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी पीछे से भाजपा के समर्थन की बिना ही चुनाव मैदान में उतर गयी| ऐसा विश्वास करने के कई कारण है| 2013 में जबसे लोजपा के तत्कालीन अध्यक्ष पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं चिराग पासवान के पिता स्वर्गीय रामविलास पासवान और भाजपा साथ आये तबसे दोनों के बीच कोई खास दिक्कत नही आई| जब रामविलास पासवान के साथ कोई दिक्कत नही आई तो फिर चिराग पासवान गठबंधन से बहार कैसे चले गये|
अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह चाहते तो क्या अपने आप को प्रधानमंत्री मोदी का हनुमान बताने वाले चिराग पासवान राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक गठबंधन यानि NDA में नहीं बने रहते? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह की कोशिश के बाद भी चिराग पासवान NDA से बाहर चले गये ऐसा कोई मानने को तैयार नही है|
ऐसा नही मानने के कई कारण है| पुरे चुनाव के दौरान चिराग पासवान अपने आप को प्रधानमंत्री मोदी का हनुमान बताते रहे, एकबार भाजपा की आलोचना नही की, उनके निशाने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) यानि जदयू ही रहा, बड़ी संख्या में भाजपा के कई बड़े-बड़े नेता जिनकी पार्टी के प्रति निष्ठा को लेकर कोई संदेह नही था अचानक लोजपा में शामिल हो गये और उसकी टिकट पर जदयू के उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर गए| जाहिर सी बात है जब भाजपा के बड़े-बड़े नेता लोजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने गए और चिराग पासवान कह रहे थे की चुनाव के बाद भाजपा लोजपा की सरकार बनेगी तो भाजपा के मतदाता के साथ-साथ भाजपा के कार्यकर्त्ता भी साथ आ गए| जब चुनाव प्रचार शुरू हुआ तो जदयू की लाख कोशिशो के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी ने न तो चिराग पासवान या उनकी पार्टी लोजपा का नाम लिया और नही उनकी सीधी आलोचना ही की उलटे अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत ही स्वर्गीय रामविलास पासवान की प्रशंसा से की|
आखिर भाजपा चाहती क्या थी? क्या थी उसकी रणनीति? क्या उसे नही मालूम की इन वजहों से सबसे ज्यादा नुकसान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं उनकी पार्टी जदयू को हो रहा है और अगर कही जदयू के मतदाता भी इसी तरह की सोच में आ गये तो भाजपा का भी नुकसान हो सकता है?
भाजपा को यह सब मालूम थी और वह हर परिस्थिति के लिए तैयार भी है ऐसा लग रहा है| भाजपा हर हाल में जदयू से ज्यादा सीटें जितना चाह रही है उसको लगता है की यही वह मौका है जब वह नीतीश की छाया से बाहर निकल सकती है|
भाजपा की पहली रणनीति तो यह लग रही है की भाजपा – जदयू सरकार बनाने के करीब हो लेकिन पूर्ण बहुमत नही मिले वैसी परिस्थिति में चिराग पासवान को साथ लिया जाए और उनसे शर्त रखवाया जाए की भाजपा का मुख्यमंत्री हो| दूसरा और भाजपा जदयू गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिले भी तो भाजपा बड़ी पार्टी बने ताकि कुछ समय बाद उसका मुख्यमंत्री बन जाए|
लेकिन पार्टी के कुछ नेताओ के अनुसार पार्टी उस परिस्थिति के लिए भी तैयार है की अगर दाव उल्टा पड़ जाए और उसे विपक्ष में बैठना पड़े| पार्टी का मानना है की अगर भाजपा बड़ी पार्टी बनती है और विपक्ष में भी बैठना पड़ता है तो कोई दिक्कत नहीं है उस परिस्थिति में सत्ता के बिना जदयू धीरे धीरे बहुत ही कमजोर हो जाएगी और सबकुछ भाजपा के नियंत्रण में आ जायेगा|
अगर सीधी बात करें तो भाजपा की एकमात्र लक्ष्य है हर परिस्थिति में सबसे बड़ी पार्टी बनकर आना| यह कितना सफल हुआ मंगलवार 10 नवम्बर को पता चल जायेगा|