मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से अतिनिकटता ने छीनी सुशील मोदी की उपमुख्यमंत्री की कुर्सी

अंततः बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की जोड़ी टूट गयी है| बिहार के राजनितिक गलियारों में परमानेंट उपमुख्यमंत्री कहे जाने वाले सुशील कुमार मोदी इसबार नीतीश कुमार के मंत्रीमंडल में नहीं होंगे|

सुशील कुमार मोदी के सबसे बड़े समर्थक थे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार| मुख्यमंत्री से यह अतिनिकटता सुशील मोदी के लिए हानिकारक साबित हुआ| सुशील मोदी सबसे आगे बढ़कर सभी मुद्दों पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बचाव करते रहे है| यही बात भाजपा के बड़े नेताओ को रास नही आती थी| उनके ऊपर भाजपा में नीतीश कुमार का प्रतिनिधि होने तथा नीतीश कुमार के प्रवक्ता होने का आरोप लगता रहा है जो जनता दल यूनाइटेड से भी ज्यादा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बचाव करते है|

सुशील कुमार मोदी पर भाजपा के नेता दबी जुबान में यह आरोप लगाते रहे है की पिछले 15 साल में उन्होंने भाजपा को नीतीश कुमार का पिछलगू बना दिया और भाजपा में नए नेतृत्व को उभरने ही नहीं दिया| उन्होंने बिहार में भाजपा के विस्तार के बारे में नहीं सोचा और संगठन हित पर अपने हित को प्राथमिकता दी| बिहार भाजपा के बड़े नेताओ से सुशील मोदी की कभी नहीं बनी| वे नेता जो भाजपा में नीतीश कुमार के विरोधी मने जाते थे तथा विचारधारा से टकराव पर नीतीश कुमार से दो-दो हाथ करने से भी पीछे नही हटते थे, उन्हें यातो अलग थलग कर दिया गया या उभे केंद्र की राजनीति में जाना पड़ा|

2013 में जब नरेन्द्र मोदी को भाजपा के तरफ से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने की प्रक्रिया चल रही थी तब नीतीश कुमार उसका विरोध कर रहे थे| पूरी बिहार भाजपा नरेन्द्र मोदी के साथ खड़ी थी, तब सुशील मोदी नीतीश कुमार का समर्थन कर रहे थे| उन्होंने नीतीश कुमार को PM मटेरियल भी बताया था|

आरोप यह भी है की सुशील मोदी को जब भी कोई भाजपा नेता खतरा बनता दीखता, वह नीतीश कुमार से मिलकर उसे निपटा देते| उसकी सीट अगली बार बटवारे में जदयू के कोटे में चली जाती| बिहार भाजपा में सुशील मोदी के खिलाफ कई बार बगावत हो चुकी है लेकिन हर बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सहायता से वह अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे|

सुशील मोदी की सबसे बड़ी ताकत नीतीश कुमार रहे है| लेकिन इसबार जब खुद नीतीश कुमार ही कमजोर पड़ गए तो फिर इन्हें कैसे बचाते|    

इसबार के बिहार विधानसभा के नतीजे से यह स्पष्ट हो गया की बिहार के नेतृत्व के खिलाफ जनता में गुस्सा है| इसबार तो किसी तरह सत्ता में आ गये है लेकिन अभी यदि जनता एवं कार्यकर्ताओ की परिवर्तन की आवाज नही सुनी और जरुरी कदम नहीं उठाये तो 2024 में लोकसभा एवं 2025 विधानसभा चुनाव जितना मुश्किल हो जाएगा| इसीलिए भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश की तरह दो उपमुख्यमंत्री बनाकर सरकार के पकड़ बनाने के साथ साथ अपने जनाधार को भी मजबूत करने की रणनीति बनायीं है|  

सुशील मोदी की उम्र वैसे भी 68 साल हो गयी है और अगले चुनाव तक वह 73 साल के हो जायेंगे| इस लिए पार्टी अब किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में नेतृत्व देने का निर्णय लिया जो अगले 10-15 साल तक पार्टी का नेतृत्व कर सके|


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