सन्यास की घोषणा नीतीश की अपनी अंतिम बाजी

बिहार विधानसभा चुनाव के प्रचार के अंतिम दिन पुर्णिया के धमदाहा में अपनी अंतिम रैली को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की की यह उनका अंतिम चुनाव है और कहा की अंत भला तो सब भला|

आगामी 7 नवंबर को बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के अंतिम चरण का मतदान होगा तथा 10 नवंबर को नतीजे आएंगे| पिछले 15 वर्षों से बिहार की कमान संभाल रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की कोशिश कर रहे हैं|

1974-75 के जयप्रकाश आंदोलन से अपनी राजनीति शुरू करने वाले 69 वर्षीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी सबसे मुश्किल राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं| उनकी लोकप्रियता न्यूनतम स्तर पर है और जनता में उनके प्रति भारी गुस्सा है|

भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड की गठबंधन की सरकार में 2005 में नितीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता संभाली| गठबंधन को 2010 में भी भारी सफलता मिली लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर के 2013 में नितीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी से नाता तोड़ लिया और 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले ही लड़े जिसमें भारी पराजय का सामना करना पड़ा|

2015 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पूर्व मुख्यमंत्री तथा राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव से हाथ मिला लिया| लेकिन 2017 में फिर से लालू यादव से नाता तोड़कर भारतीय जनता पार्टी के साथ आ गए और बिहार के मुख्यमंत्री बने रहे| इससे उनकी पहचान एक सत्ता लोलुप कुर्सी कुमार के रूप में बनी जो सिर्फ सत्ता में बने रहना चाहते है और वह सत्ता में बने रहने के लिए किसी के साथ भी समझौता कर सकते है|

मुख्यमंत्री के रूप में तीसरे कार्यकाल में नीतीश कुमार की प्रशासन पर पकड़ ढीली पड़ गई| चाहे वह कानून व्यवस्था की बात हो या फिर भ्रष्टाचार एवं विकास की बात हर मोर्चे पर नितीश कुमार की पकड़ ढीली पड़ती नजर आई|

2017 में नितीश कुमार एवं भारतीय जनता पार्टी दोनों एक साथ आ तो गए लेकिन दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं में पहले जैसी सहजता नही दिखी| भाजपा का नेतृत्व भी नीतीश कुमार के प्रति शशंकित ही रहा|

इसबार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी की चक्रव्यूह में फस गए हैं| वह 15 वर्षों तक भले ही बिहार के मुख्यमंत्री रहे हो लेकिन कभी भी अकेले अपने बल पर चुनाव जीतने में सफल नहीं हुए| कभी भाजपा तो कभी राजद के समर्थन से मुख्यमंत्री बनते रहे | 25 प्रतिशत के आसपास मत प्रतिशत होने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी नीतीश कुमार के पीछे ही चलती रही ताकि लालू यादव को रोका जा सके| लेकिन अब भारतीय जनता पार्टी पीछे चलने को तैयार नहीं है| वह बिहार का नेतृत्व अपने हाथ में लेना चाह रही है| लेकिन वह नीतीश कुमार को राजद के साथ जाने का मौका भी नहीं देना चाह रही थी| एक तरफ जहां नीतीश कुमार के प्रति बिहार की जनता में भारी गुस्सा दिख रहा है तो वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार में सबसे लोकप्रिय नेता है| यही वह मौका है जब भारतीय जनता पार्टी विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर के नितीश कुमार से आगे निकल सकती है और बिहार का नेतृत्व अपने हाथों में ले सकती है|

बिहार विधानसभा चुनाव शुरू होने से पहले एकतरफा दिख रहा था और सत्तारूढ़ एनडीए की जीत सुनिश्चित थी| क्योंकि नीतीश कुमार से नाराज भारतीय जनता पार्टी के मतदाताओं के पास कोई विकल्प नहीं था| वह राजद को वोट नहीं कर सकते थे और राजद को रोकने के लिए NDA को वोट करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था| नीतीश कुमार भी अपने जीत को लेकर पूर्णता अस्वस्थ थे और मान लिया था कि वह चौथी बार मुख्यमंत्री बनेंगे ही|

लेकिन चुनाव की घोषणा होते हैं नीतीश कुमार के साथ खेल हो गया| भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के शह पर लोक जनशक्ति पार्टी के मुखिया चिराग पासवान ने NDA से अलग होकर के चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी| चिराग ने जेडीयू के सभी उम्मीदवारों के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतार दिया| अपने आपको प्रधानमंत्री मोदी का हनुमान बताते हुए यह भी घोषणा कर दी कि चुनाव के बाद भाजपा लोजपा की सरकार बनेगी|

भाजपा के बड़े-बड़े नेता, पार्टी उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह, रामेश्वर चौरसिया शामिल है, लोक जनशक्ति पार्टी में शामिल हो गये| राजेंद्र सिंह संघ के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता थे और भारतीय जनता पार्टी की चुनावी राजनीति में लाने का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को जाता है|

भाजपा के वरिष्ठ नेताओ के लोक जनशक्ति पार्टी में शामिल होने से जनता विशेष करके भाजपा के मतदाताओं में भारी असमंजस की स्थिति पैदा हुई| जनता में चिराग को समर्थन मिलता देख नीतीश कुमार के दबाव में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व जिसमे पार्टी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा एवं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह शामिल है को कहना पड़ा कि भाजपा का गठबंधन लोजपा से नहीं है| फिर भी जनता में कुछ हदतक भ्रम बना ही रहा|

चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार भी चिराग का नाम नहीं लिया और ना लोक जनशक्ति पार्टी की सीधी आलोचना की|

प्रारंभ में भाजपा के पोस्टरों में सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी का फोटो होता था बाद में उसमें नीतीश कुमार का फोटो भी आने लगा जबकि जदयू के पोस्टर में शुरू से ही नीतीश कुमार के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी फोटो था|

इन सब प्रयासों से NDA गठबंधन जनता का विशेष करके भारतीय जनता पार्टी के मतदाताओं का गुस्सा कुछ कम करने में सफल तो हुआ लेकिन वह पूर्णता दूर नहीं हुआ है| पिछला 5 साल का कार्यकाल बहुत ही फीका रहा है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति जनता में नाराजगी है| चिराग पासवान लगातार उस गुस्से को हवा दे रहे हैं| वह मतदाता जो नीतिश से नाराज तो है लेकिन राजद का समर्थन नहीं कर सकता उनके लिए चिराग एक विकल्प बनकर आए हैं|

लगभग 40-50 सीटें ऐसी हैं जहां पासवान ने भाजपा पृष्ठभूमि के मजबूत उम्मीदवारों को मैदान में उतरा है और जिन्हें कुछ हद तक भाजपा के कार्यकर्ताओं का समर्थन भी प्राप्त हो रहा है| उन सीटों पर चिराग की पार्टी का जितना भले ही सुनिश्चित ना हो लेकिन वह जदयू के उम्मीदवारों के लिए खतरा बन गए है|

सन्यास की घोषणा कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी अंतिम बाजी चल दी है| उन्होंने मतदाताओं के साथ-साथ भाजपा नेतृत्व को भी यह संदेश दिया है कि वह अब मैदान से हटने को तैयार हैं| नहीं उम्मीद है एक तरफ जहां भाजपा और उसके समर्थक यह समझेंगे कि वह भारतीय जनता पार्टी के लिए रास्ता साफ कर रहे है तो दूसरी तरफ उन्हें उम्मीद है की जनता भावुक होगी, गुस्सा शांत होगा और उन्हें सहानुभूति का वोट मिलेगा|

जो भी हो यह चुनाव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के युग के अंत की शुरुआत है| बहुत जल्द बिहार भाजपा में भी नया नेतृत्व की कमान 50 वर्षीय केन्द्रीय गृहराज्यमंत्री नित्यानंद राय के हाथो में होगा|

बिहार की भावी राजनीति नित्यानंद राय, तेजस्वी यादव, एवं चिराग पासवान के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देगी|


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