केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने अनाज (चावल, गेहूं, जौ, मक्का और सोरघम), गन्ना और चुकंदर जैसी खाद्य वस्तुीओं से इथेनॉल का उत्पादन करने एवं ईंधन ग्रेड इथेनॉल सम्मिश्रण के लिए संशोधित योजना को मंजूरी प्रदान कर दी है|
इसके तहत अनाज (चावल, गेहूं, जौ, मक्का और सोरघम), गन्ना और चुकंदर जैसी खाद्य वस्तुीओं से इथेनॉल का उत्पादन किया जाएगा, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होगी|
सरकार ने 2022 तक पेट्रोल के साथ ईंधन ग्रेड इथेनॉल के 10 प्रतिशत, 2026 तक 15 प्रतिशत और 2030 तक 20 प्रतिशत सम्मिश्रण का लक्ष्य तय किया है। सरकार 20 प्रतिशत के सम्मिश्रण लक्ष्य को 2025 से पहले ही पूरा करने की योजना बना रही है|
अतिरिक्त गन्ने और चीनी का उपयोग इथेनॉल बनाने के लिए करने से किसानों को उनके बकाया गन्ना मूल्य का भुगतान हो सकेगा|
2010-11 के चीनी सत्र से गन्ने की बेहतर किस्मों के आने के बाद देश में चीनी का अतिरिक्त उत्पादन हुआ है (2016-17 के चीनी सत्र में सूखे के कारण हुए कम उत्पादन को छोड़कर) और उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में भी यह रूख जारी रहेगा। सामान्य चीनी सत्र (अक्टूबर से सितम्बर) में करीब 320 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि हमारी घरेलू खपत करीब 260 लाख मीट्रिक टन है। सामान्य चीनी सत्र में 60 लाख मीट्रिक टन के इस अतिरिक्त उत्पादन से चीनी मिलों को अपनी कीमत तय करने में दबाव का सामना करना पड़ता है। 60 लाख मीट्रिक टन का यह अतिरिक्त भंडार बिक नहीं पाता और इस तरह चीनी मिलों की 19 हजार करोड़ रुपये की राशि फंस जाती है और उनकी पूंजी तरलता की स्थिति को प्रभावित करती है। परिणामस्वरूप वे गन्ना किसानों को उनके उत्पाद की बकाया राशि का भुगतान नहीं कर पाते। चीनी के इस अतिरिक्त भंडार से निपटने के लिए चीनी मिलें चीनी का निर्यात करती हैं और इसके लिए उन्हें सरकार से वित्तीय सहायता मिलती है, लेकिन विश्व व्यापार संगठन की व्यवस्था के अनुरूप भारत, विकासशील देश होने के कारण सिर्फ 2023 तक ही चीनी के निर्यात के लिए वित्तीय सहायता दे सकता है।
अत: इस अतिरिक्त गन्ने और चीनी का इथेनॉल के उत्पादन के लिए उपयोग करना ही चीनी के अतिरिक्त भंडार से निपटने का सही रास्ता है। अतिरिक्त चीनी के इस उपयोग से मिलों द्वारा भुगतान किए जाने वाले चीनी के घरेलू मिल-मूल्य में स्थिरता आएगी और चीनी मिलों को इसके भंडारण की समस्या से निजात मिलेगी। इससे उनके पूंजी प्रवाह में सुधार होगा और उन्हें किसानों को उनके बकाया मूल्य का भुगतान करने में सुविधा होगी। इसके साथ ही इससे चीनी मिलों को आने वाले सालों में अपना कामकाज चलाने में भी मदद मिलेगी।
ईंधन स्तर के इथेनॉल के उत्पादन को बढ़ाने के लिए सरकार भट्टियों को भी भारतीय खाद्य निगम में उपलब्ध मक्का और चावल से इथेनॉल का उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। सरकार ने मक्का और चावल से निकाले जाने वाले इथेनॉल का लाभकारी मूल्य भी तय किया है।
सरकार पेट्रोल में इथेनॉल के 20 प्रतिशत मिश्रण के लक्ष्य को 2025 से पहले हासिल करने की योजना बना रही है। हालांकि देश में इस समय चीनी के अतिरिक्त भंडार से इथेनॉल निकालने और उसकी आपूर्ति तेल विपणन कंपनियों को करने की पर्याप्त क्षमता नहीं है, जबकि भारत सरकार ने तेल विपणन कंपनियों को पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण करने का तय लक्ष्य दिया हुआ है।
इसके अलावा, पेट्रोल और इथेनॉल के मिश्रण के लक्ष्य को सिर्फ गन्ने और चीनी से इथेनॉल का उत्पादन कर प्राप्त नहीं किया जा सकता तथा पहली पीढ़ी (1जी) के इथेनॉल का उत्पादन अन्य खाद्य वस्तुओं जैसे अनाज, चुकंदर आदि से भी किए जाने की आवश्यकता होगी, जिसकी पर्याप्त क्षमता फिलहाल देश में नहीं है। अत: देश में पहली पीढ़ी के इथेनॉल का उत्पादन करने के लिए अनाजों (चावल, गेंहू, जौ, मक्का और ज्वार) गन्ने और चुकंदर आदि से इथेनॉल निकालने की क्षमता को बढ़ाने की बहुत जरूरत है।
सरकार द्वारा स्वीकृत योजना के तहत निम्न श्रेणियों को इथेनॉल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा ऋण पर लगने वाले ब्याज के वहन की संशोधित योजना लाई जाएगी :-
इसके अतिरिक्त इस योजना के तहत
सरकार को उम्मीद है की इस प्रस्तावित कदम से विविध प्रकार के अनाजों से पहली पीढ़ी के इथेनॉल के उत्पादन में वृद्धि होगी, पेट्रोल में इथेनॉल के मिश्रण के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकेगा और इथेनॉल को ऐसे ईंधन के तौर पर प्रोत्साहित किया जा सकेगा, जो स्वदेश में उत्पादित, गैर-प्रदूषणकारी और अक्षय होगा तथा जिससे पर्यावरण और इको-सिस्टम में सुधार होगा। इसके परिणामस्वरूप देश के तेल आयात व्यय की बचत की जा सकेगी। यह किसानों को उनके बकाये का समय पर भुगतान भी सुनिश्चित करेगा।