गुलाब, पपीता, पालक, चुकंदर से बने रंग-गुलाल से मनाएं हर्बल होली

उमंग की अभिव्यक्ति का पर्व होली है। बसंत के समय अपने चारों ओर सेमल और पलाश से आच्छादित सड़कों और जंगलों को देखकर लगता है कि, प्रकृति भी अपना उल्लास व्यक्त कर रही है।

होली पर रंग गुलाल का प्रयोग खूब होता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से रासायनिक गुलाल का प्रयोग उचित नहीं होता, इस कारण बीते कुछ सालों से हर्बल गुलाल (Herbal Gulal) के प्रयोग में लोगों की रुचि बढ़ी है। इसी को लेकर छत्तीसगढ़ और राजस्थान की महिलाओं ने अनूठा प्रयोग किया है। यहां महिलाएं चुकंदर, पपीते, पालक और अलग-अलग फूलों व पेड़ों की पत्तियों से गुलाल बना रही हैं।

हरी सब्जियों से गुलाल बनाती छत्तीसगढ़ की महिलाएं

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर में सब्जियों से अलग-अलग तरह के गुलाल बनाएं जा रहे हैं। पालक की पत्तियों से हरा, चुकंदर से गुलाबी और लाल रंग, पपीते और पलाश से केसरिया रंग का निर्माण किया जा रहा है। बलरामपुर के जाबर कृषि विज्ञान केंद्र के अधिकारी एन गौतम कहते हैं कि, प्राकृतिक रंगों से होली बनाने के लिए महिलाओं को पहले प्रशिक्षण दिया गया। सब्जी बागान से पालक, पपीता और चुकंदर तोड़ लिया जाता है। इन्हें उबालकर, पीस कर इसमें अरारोट मिलाया जाता है। फिर प्राकृतिक एसेंस मिलाकर और कुछेक अन्य प्रक्रियाओं के बाद गुलाल तैयार हो जाता है। महिलाएं प्रतिदिन 20 किलो तक गुलाल का उत्पादन कर रही हैं। गुलाल का 250 ग्राम का पैकेट तैयार किया गया है। पैकेजिंग के बाद उसे बाजार में उतारा जा रहा है और लोग इसे हाथों-हाथ ले रहे हैं।

उदयपुर में गुलाब और कनेर के फूल से बन रहा हर्बल गुलाल

राजस्थान के उदयपुर में महिलाएं अमलतास, पलाश, गुलाब और कनेर से रंग-गुलाल बना रही हैं। राजस्थान में यह प्रकल्प 15 सालों से चल रहा है। मुख्य वन संरक्षक आर.के. जैन बताते हैं कि, स्थानीय महिलाएं ढाक, गुलाब, कनेर, बोगन, टेकोमा आदि के फूलों को सुखाती हैं। इसमें अरारोट का मिश्रण मिलाकर, पारम्परिक तरीके से गुलाल बनाती हैं। इसमें किसी भी प्रकार के रासायनिक रंगों का प्रयोग नहीं किया जाता है। महिलाएं आर्थिक रूप से सबल तो हो ही रही, साथ ही नागरिक भी बिना संशकित हुए इस हर्बल गुलाल का प्रयोग कर सकते हैं।

आर्थिक रूप से भी महिलाओं को हो रहा लाभ

छत्तीसगढ़ और राजस्थान की महिलाओं ने जो हर्बल गुलाल बनाएं हैं, उससे उन्हें काफी लाभ हो रहा। स्थानीय महिलाओं द्वारा बनाएं गुलाल की पैकेजिंग कर बाजार में बेचा जा रहा है। जिला प्रशासन और वन-विभाग के स्टॉल भी लगे हुए हैं, जहां से लोग गुलाल खरीद रहे हैं। यह वोकल फॉर लोकल का उदाहरण है। गुलाल बनाने की प्रक्रिया में सलंग्न महिलाओं को प्रतिदिन 200 से 250 रुपए की आमदनी हो रही है। जिन खेतों से सब्जियां मोल ली जाती हैं, वहां के किसानों को फायदा मिल रहा है। हर्बल गुलाल लोकप्रिय भी है।

हर्बल गुलाल से स्वास्थ्य पर नहीं पड़ता कोई दुष्प्रभाव

पहले के समय में पलाश के फूलों को पानी में भिगोकर प्राकृतिक रंग तैयार किया जाता था और इसी से होली खेली जाती थी। बाद में रासायनिक रंगों का प्रचलन हुआ और अब हर्बल उत्पादों की मांग बढ़ रही है। सब्जियों और पत्तियों से बने ये हर्बल गुलाल स्वास्थ्य पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं डालते। रासायनिक गुलाल से त्वचा,आंखों और बालों को नुकसान पहुंच सकता है। सांस की बीमारियां उभर सकती है, लेकिन हर्बल गुलाल के प्रयोग से इस तरह के दुष्प्रभाव दिखाई नहीं देते।

 


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