बिहार की राजनीति में दिल्ली स्थित 12 जनपथ (12 Janpath) बंगले को लेकर तरह-तरह के राजनीतिक कयास लगाए जा रहे हैं। यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता दिख रहा है। इस पर सभी दल फिलहाल तो नपे तुले अंदाज में ही बयान देर रहे है लेकिन कभी भी यह बड़े राजनीतिक विवाद का मुद्दा बन सकता है।
दरअसल 12 जनपथ (12 Janpath) का सरकारी बंगला पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान (Ramvilas Paswan) को आवंटित हुआ था। वह लगभग 31 वर्षों तक उस बंगले में रहे। चिराग पासवान (Chirag Paswan) भी बचपन से ही उसी बंगले में रहते आए। सांसद बनने के बाद एक सांसद के हैसियत से चिराग पासवान को 23 नॉर्थ एवेन्यू का बंगला आवंटित हुआ है। लेकिन वह अपने पिता रामविलास पासवान के साथ 12 जनपथ बंगले में ही रह रहे थे।
पिछले साल रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद अब यह बंगला रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को आवंटित हो गया है। पासवान परिवार को अब 12 जनपथ का बंगला खाली करना है। लेकिन बंगला खाली करने से ठीक पहले चिराग पासवान ने 12 जनपथ बंगले में अपने पिता पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की एक मूर्ति लगा दी है। अक्टूबर माह तक चिराग पासवान को यह बंगला खाली करना है पर उससे ठीक पहले बंगले में रामविलास पासवान की मूर्ति लग जाने से मामला पेचीदा एवं राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गया है।
यद्दिपी चिराग पासवान ने इस पर अभी कुछ नहीं कहा है लेकिन उनके समर्थक 12 जनपथ को रामविलास पासवान की स्मारक बनाने की मांग करने लगे हैं। यहां तक कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं हम पार्टी के मुखिया जीतन राम माझी ने भी स्मारक बनाए जाने की मांग कर दी है। उधर बुधवार को चिराग पासवान ने पटना में बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव से उनके आवास पर मुलाकात की।
भाजपा के लिए दुविधा यह है कि अगर चिराग पासवान खुद बंगला खाली नहीं करते हैं और रामविलास पासवान की मूर्ति खुद नहीं हटाते हैं तो टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। चिराग पासवान से भी वैसे ही बंगला खाली कराना पड़ सकता है जैसे चौधरी अजीत सिंह से कराया गया था। तब शहरी विकास मंत्रालय ने बंगले का बिजली पानी काट दिया था।
भाजपा ऐसा बिल्कुल नहीं चाहती की इस तरह की कोई स्थिति उत्पन्न हो, जिसे रामविलास पासवान के अपमान के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। क्योंकि भाजपा लगातार दलित वोटों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करती रही है। बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश में भी भाजपा गैर जाटव वोटो को अपने साथ जोड़ना चाहती है। जिसमें पासवान समाज सबसे ज्यादा है। अगर टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई तो भाजपा के लिए भी स्थिति असहज हो जाएगी। क्योंकि राजनीतिक विवशताओं के बाद भी बंगला तो खाली कराना ही पड़ेगा।
गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय का स्पष्ट आदेश है कि किसी भी सरकारी बंगले को स्मारक नहीं बनाया जा सकता है। इसीलिए न चाहते हुए भी अजीत सिंह को भी बंगला खाली करना पड़ा और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को भी।
अब निर्णय चिराग पासवान को लेना है कि वह चाहते क्या है। वह टकराव की स्थिति पैदा कर जनता की सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर बिहार में अपने लिए राजनितिक संभावना तलासना चाहते हैं और भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा करना चाहते हैं या भाजपा से मोलभाव कर बीच का रास्ता निकाल लेते हैं।
चिराग पासवान के लिए भी निर्णय आसान नहीं होगा। पिता से विरासत में मिली लोक जनशक्ति पार्टी वह पहले गवां चुके हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले से ही नाराज ऐसे में भाजपा एवं केंद्र सरकार को भी अपने खिलाफ कर लेने का खतरा क्या चिराग पासवान उठाएंगे उठाएंगे?