शिवसेना के आंखों में क्यों चुभते हैं नारायण राणे? गिरफ्तारी का क्या होगा राजनीतिक परिणाम?

मंगलवार को महाराष्ट्र पुलिस ने केंद्रीय सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्योग MSME मंत्री नारायण राणे Narayan Rane को गिरफ्तार कर लिया। जन आशीर्वाद यात्रा पर कोंकण क्षेत्र का दौरा कर रहे केंद्रीय मंत्री नारायण राणे ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे Udhav Thackrey पर विवादित टिप्पणी की थी। जिसके बाद पूरे महाराष्ट्र में उनके खिलाफ कई एफआईआर दर्ज कराई गई। हालांकि खुद शिवसेना के नेता दूसरे बड़े नेताओं के खिलाफ इस तरह की टिप्पणियां करते रहते हैं।

इस गिरफ्तारी के साथ ही कभी सहयोगी रहे भाजपा एवं शिवसेना के आपसी संबंध रसातल में पहुंच गए हैं। इस घटना के बाद राज्य की राजनीति का गरमाना एवं तल्खी बढ़ना निश्चित है।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह दूसरा मौका

स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह दूसरा मौका है जब किसी राज्य की पुलिस ने किसी केंद्रीय मंत्री को गिरफ्तार किया है। इससे पहले 20 वर्ष पूर्व तमिलनाडु की पुलिस ने 30 जून 2001 को तत्कालीन केंद्रीय मंत्री मुरसोली मारन एवं टीआर बालू को एम करुणानिधि के साथ गिरफ्तार कर लिया था।

नारायण राणे एवं उद्धव ठाकरे के बीच कभी नहीं पटी

अब प्रश्न यह है कि नारायण राणे शिवसेना एवं ठाकरे परिवार को इतना चुभते क्यों है कि उनका नाम आते ही शिवसेना का ब्लड प्रेशर हाई हो जाता है? आखिर क्या है उद्धव ठाकरे एवं नारायण राणे के बीच दुश्मनी का कारण?  और भाजपा ने राणे को आगे क्यों बढ़ाया है?

केंद्रीय मंत्री एवं महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री 69 वर्षीय नारायण राणे एक स्ट्रीट फाइटर यानी सड़क की राजनीति करने वाले नेता है। मराठा नेता नारायण राणे ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत शिवसेना से ही की थी। नारायण राणे ने शिवसेना सुप्रीमो बाला साहब ठाकरे के नेतृत्व में खूब आंदोलन, हिंसक विरोध एवं तोड़-फोड़ की आक्रामक राजनीति की। नारायण राणे शिवसेना की आक्रामक एवं हिंसक राजनीति, सड़क पर प्रदर्शन एवं तोड़फोड़ की राजनीति के अगुआ थे।

नारायण अपनी आक्रामकता एवं गाली गलौज की भाषा के लिए जाने जाते हैं। वह बालासाहेब ठाकरे के बहुत ही विश्वस्त थे। 1990 में नारायण राणे पहली बार शिवसेना के विधायक बने तथा 1999 में शिवसेना भाजपा सरकार में महाराष्ट्र के 13वें मुख्यमंत्री बने।

शिवसेना में नारायण राणे एवं उद्धव ठाकरे के बीच कभी नहीं पटी। उद्धव ठाकरे को नारायण राणे की आक्रामकता पसंद नहीं थी। शिवसेना के अंदर दो गुट हुआ करते थे। उद्धव ठाकरे, मनोहर जोशी एवं सुभाष देसाई का एक अपना गुट था तो वहीं दूसरी तरफ नारायण राणे एवं राज ठाकरे का अपना अलग गुट था।

नारायण राणे एवं उद्धव ठाकरे कभी भी एक दूसरे को पसंद नहीं करते थे। जब 1999 में बाला साहब ठाकरे ने नारायण राणे को मुख्यमंत्री बनाया था तब भी उद्धव ठाकरे ने उसका विरोध किया था। बाद में नारायण राणे ने अपनी किताब ने 1999 विधानसभा चुनाव में शिवसेना भाजपा सरकार की मामूली अंतर से हार के लिए उद्धव ठाकरे को जिम्मेदार ठहराया|

2005 जब शिवसेना में उत्तराधिकार की लड़ाई छिड़ी तो उद्धव ठाकरे से मतभेद के कारण नारायण राणे शिवसेना से अलग हो गए। नारायण राणे को उद्धव ठाकरे का नेतृत्व मंजूर नहीं था। राणे कांग्रेस में चले गए तथा राज्य सरकार में राजस्व मंत्री बन गए। बाद में वह 2017 में भाजपा में शामिल हो गए।

नारायण राणे एवं उद्धव ठाकरे की एक दूसरे के प्रति नापसंद ने धीरे धीरे नफरत एवं दुश्मनी का रूप ले लिया। दोनों एक दूसरे की आंखों में चुभते रहते हैं।

नारायण राणे शिवसेना की रग रग से वाकिफ है

नारायण राणे सभी तरह के संसाधनों से युक्त एक बहुत ही ताकतवर मराठा नेता है। जिन्हें जमीन पर सड़क पर संघर्ष एवं टकराव की राजनीति खूब पसंद है। नारायण राणे की मुंबई एवं कोंकण क्षेत्र में जबरदस्त पकड़ है। कोंकण क्षेत्र में वह काफी लोकप्रिय भी है। मुंबई एवं कोंकण क्षेत्र शिवसेना का गढ़ है जबकि इन क्षेत्रो में भाजपा की स्थिति कमजोर रही है।

नारायण राणे शिवसेना की रग रग से वाकिफ है। वह शिवसेना की आक्रामक एवं हिंसक राजनीति का नेतृत्व कर चुके हैं। शिवसेना उन्हें अपने विरोध प्रदर्शन एवं हिंसक राजनीति से डरा नहीं सकती। नारायण राणे के पास समर्थकों एवं कार्यकर्ताओं की अपनी फौज है जो शिवसेना को उसी की भाषा में जवाब दे सकते हैं। 2019 में विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद जिस तरह से शिवसेना ने भाजपा से नाता तोड़कर के कांग्रेस एवं एनसीपी के साथ मिल सरकार बना ली उसको भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भूला नहीं है।

यद्यपि नारायण राणे 2017 से ही भाजपा में है लेकिन जब तक भाजपा शिवसेना साथ थे तब तक शिवसेना के दबाव में भाजपा ने नारायण राणे को राज्य या केंद्र सरकार में शामिल नहीं किया। अब जब भाजपा शिवसेना के  संबंध टूट गए हैं तो भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को कोई ऐसा चेहरा चाहिए था जो शिवसेना को उसकी भाषा में सड़क छाप अंदाज में जवाब दे सके। इसके लिए राणे से अच्छा विकल्प कोई हो ही नहीं सकता। नारायण राणे के बारे में एक कहावत है कि आप उन्हें पावर और लाल बत्ती दीजिए वह कुछ भी कर देंगे।

भाजपा 2022 बीएमसी चुनाव में हर हाल में शिवसेना को निपटाना चाहती है

भाजपा शिवसेना को ऐसा सबक सिखाना चाहती है कि वह उसे भूल ना पाए। 2022 के शुरू में मुंबई महानगर पालिका यानी बीएमसी का चुनाव होने वाला है। शिवसेना बीएमसी में पिछले 35 साल से काबिज है। बीएमसी शिवसेना की सबसे बड़ी ताकत एवं कमजोरी रही है। अगर शिवसेना बीएमसी चुनाव हार जाती है तो उसकी कमर टूट जाएगी। भाजपा 2022 बीएमसी चुनाव में हर हाल में शिवसेना को निपटाना चाहती है। इसीलिए नारायण राणे को केंद्र में मंत्री बनाया गया है। यह बात शिवसेना को भी मालूम है।

2012 बीएमसी चुनाव में शिवसेना को 17% वोट तथा 52 सीटें मिली थी। वही 2017 में 28% वोट तथा 84 सीटें मिली। 2017 में शिवसेना भाजपा ने अलग-अलग बीएमसी चुनाव लड़ा था तथा पहली बार भाजपा मुंबई में एक ताकत बनकर उभरी उसे 27% वोट तथा 82 सीटें हासिल हुई।

मुंबई में लगभग 45% वोट गुजराती, मारवाड़ी, हिंदी भाषी, कन्नड़, तमिल और तेलुगु लोगो का है जो अधिकतर भाजपा का समर्थन करते हैं। वैसे तो मुंबई में मराठी वोट लगभग 30 से 32% है लेकिन शिवसेना का मूल वोट बैंक गरीब एवं मध्यम वर्ग का मराठी वोट है जिसकी आबादी लगभग 20% है। उच्च एवं संपन्न मराठी वर्ग वैसे भी शिवसेना को खास पसंद नहीं करता है।

मुंबई में मुस्लिम वोटर लगभग 22% है। जो मूल रूप से कांग्रेस का समर्थन करते हैं। मुस्लिम वोटो में अबू आजमी एवं ओवैसी की पार्टी की भी अपना हिस्सेदारी है।

शिवसेना के पास समस्या यह है कि मुस्लिम वोट के लिए अगर वह कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है तो उसके पास से कट्टर हिंदू वोटों के खिसकने का डर है। वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी नारायण राणे के जरिए शिवसेना के मूल मराठी वोटों में सेंधमारी करना चाह रही है। भाजपा का मानना है कि नारायण राणे के जरिए शिवसेना के मूल मराठी वोट बैंक में अगर 5% भी सेंधमारी करने में सफल हो जाती है शिवसेना का खेल खत्म हो जाएगा।

यह नारायण राणे की दोबारा लॉन्चिंग

महाराष्ट्र पुलिस द्वारा नारायण राणे की गिरफ्तारी से भाजपा के उस अभियान को और ताकत ही मिलेगी। जिस नारायण राणे को महाराष्ट्र की राजनीति के हाशिए पर समझा जाने लगा था, इस गिरफ्तारी ने उन्हें एक बार फिर से महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र बिंदु में ला दिया है। यह एक तरह से उनकी दोबारा लॉन्चिंग है।

इस गिरफ्तारी से एक तरफ जहां विपक्ष का फासिस्ट चेहरा सबके सामने आया है तो वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र भाजपा के कार्यकर्ताओं में स्पष्टता एवं नया जोश आ जाएगा। इस गिरफ्तारी ने यह भी स्पष्ट कर दिया की अभी भाजपा एवं शिवसेना का साथ आना संभव नहीं है।

 


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